हर एक शहर में कम से कम एक ऐसा संगठन होना चाहिए, जो 24 घंटे जानवरों के लिए काम करे। मैं हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली हूं। बचपन से मैंने देखा, मेरे ननिहाल में कुत्ते, बिल्ली जैसे कई जानवर हुआ करते थे, जिनकी देखभाल की जाती थी। वहीं का असर था कि मुझे पर्यावरण और जानवरों के प्रति गहरा लगाव हो गया। अभी मैं बायोटेक्नोलॉजी में इंजीनियरिंग कर रही हूं। एक बार हमारे घर के बाहर रोड पर कुत्ते के छोटे-से बच्चे को एक गाड़ी ने टक्कर मार दी जिससे उसे गहरी चोट आई।
मैं और पापा उसे तुरंत डॉक्टर के पास लेकर गए। हमसे कई डॉक्टरों ने कहा कि उसे बचा पाना मुश्किल है, पर मैंने हार नहीं मानी। उसके सही इलाज के लिए हम उसे दिल्ली लेकर गए, वहां उसका ऑपरेशन हुआ। उस कुत्ते के इलाज के बाद मैंने उसे अपने घर में ही रखा और उसकी देखभाल की। इसके बाद मैंने इन बेसहारा, बेजुबान जीवों की देखभाल शुरू कर दी।
मैं करीब 60 से ज्यादा बेसहारा कुत्तों की देखभाल कर रही हूं। इन्हें मैं अपने परिवार का हिस्सा मानती हूं। इनके खाने-पीने या फिर उनकी स्वास्थ्य जरूरतों में कोई कमी न आए, इसके लिए मैंने कॉलेज से आने के बाद ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। इससे हर महीने लगभग 7,000 रूपये मिल जाते हैं, जो मैं इन जानवरों के खाने-पीने और चिकित्सा पर खर्च करती हूं। मैं एक मध्यम आयवर्ग परिवार से हूं, इसलिए जितना भी हमसे इनके लिए हो पाता है, हम करते हैं।
अपने घर के बाहर इनके लिए दो छोटे-छोटे शेल्टर होम भी बनवाए हैं, जहां पर ये जीव किसी भी मौसम में आकर आराम से सो सकते हैं। कॉलेज जाने से पहले गली में इन्हें खाना खिलाती हूं। इसके अलावा अपनी यूनिवर्सिटी में भी असहाय घूमने वाले कुत्तों के लिए खाना लेकर जाती हूं। सर्दियों में इनके लिए रजाई और गर्म कम्बल आदि की व्यवस्था भी रहती है। पर्यावरण के प्रति प्रेम और जागरूकता लाने के लिए मैं ट्यूशन पढ़ने आने वाले बच्चों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहना भी सिखाती हूं।
परिणामस्वरूप अब ये बच्चे अपने जन्मदिन पर पेड़ लगाना चाहते हैं और इन जानवरों को खाना खिलाना चाहते हैं। मेरा मानना है कि हर एक शहर में कम से कम एक ऐसा संगठन हो, जो 24 घंटे जानवरों के लिए काम करे। यदि किसी इमरजेंसी में उन्हें फोन किया जाए तो वे पहुंच सकें। अगर ऐसा हो जाए, तो वे लोग भी आगे आएंगे जो मदद तो करना चाहते हैं, लेकिन अपने यहां जानवरों को रख नहीं सकते। दरअसल लोगों को जानवरों के व्यवहार की समझ नहीं होती।
मैंने और मेरे परिवार ने इस बारे में काफी रिसर्च की तो हमें पता चला कि जानवर तभी हमला करते हैं, जब उन्हें डर लगता है। मेरे बहुत से ऐसे पड़ोसी भी हैं, जो कहते हैं कि क्या जरूरत है गली में इस तरह जानवरों को इकट्ठा करने की। पर मैं इन चुनौतियों से नहीं डरती क्योंकि मुझे यह पता है कि, मैं नेक काम कर रही हूं।
मेरी मां जहां हर रोज इन बेजुबान जानवरों के लिए खाना तैयार करती हैं, वहीं इनकी साफ-सफाई में पिता और भाई सहयोग करते हैं। साथ ही जानवरों के डॉक्टर कमल भी हैं, जो जरूरत पड़ने पर तत्काल आकर मदद करते हैं। मेरा मानना है कि इस तरह बेजुबानों की मदद के लिए कोई एक छोटा-सा भी कदम उठाये, तो यह भी मेरे लिए बहुत है।
मुझे किसी तरह का प्रचार नहीं चाहिए। सिर्फ अपना काम कर रही हूं और जितना कर सकती हूं, उतनी मदद करती रहूंगी। बेजुबान जीवों के संरक्षण की दिशा में काफी काम करने की जरूरत है। लोगों को जानवरों से जुड़े कानूनों के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।