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स्वतंत्रता दिवस पर देश को मिल सकती है कोरोना से आजादी!

Fri, 03 Jul 2020 07:29 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • कोवाक्सिन के मानव परीक्षण की प्रक्रिया सात जुलाई से करने की घोषणा, 15 अगस्त तक हो सकती है लांच     
  • आईसीएमआर और भारत बायोटेक कंपनी मिलकर बना रहे हैं कोरोना की कोवाक्सिन वैक्सीन
  • जायड्स कैडिला (Zydus Cadilla) के वैक्सीन को भी ह्यूमन ट्रायल की अनुमति मिली
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कोवाक्सिन वैक्सीन - फोटो : File Photo
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विस्तार
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इस बार का स्वतंत्रता दिवस देशवासियों के लिए कुछ खास हो सकता है। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो 15 अगस्त को देश को कोरोना की पहली वैक्सीन मिल सकती है।

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आईसीएमआर ने कहा है कि वह भारत बायोटेक कंपनी के साथ मिलकर कोरोना की जिस कोवाक्सिन वैक्सीन पर काम कर रहा है, 07 जुलाई से उसका मानवीय परीक्षण शुरू कर दिया जायेगा। इस परीक्षण में सफल परिणाम मिलने के बाद 15 अगस्त को वैक्सीन को लांच कर दिया जाएगा।

आईसीएमआर (Indian Council of Medical Research) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने इस वैक्सीन के ट्रायल को लेकर एक विभागीय निर्देश जारी करते हुए कहा है कि इस वैक्सीन का ट्रायल सात जुलाई को शुरू हो जानी चाहिए और इसमें किसी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए।
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इसके ट्रायल के परिणामों के अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों की टीम भी बना दी गई है। बता दें कि इस वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल की अनुमति 30 जून को ही मिली है।

कोवाक्सिन वैक्सीन को बनाने के लिए आईसीएमआर, राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (NIV) पुणे और हैदराबाद की कंपनी भारत बायोटेक साथ मिलकर काम कर रही हैं।

देश की एक अन्य कंपनी जायड्स कैडिला (Zydus Cadilla) के वैक्सीन को भी ह्यूमन ट्रायल की अनुमति मिल गई है और यह कंपनी भी वैक्सीन को जल्द से जल्द लाने के लिए प्रयास कर रही है।

इतनी जल्दी वैक्सीन लाना कैसे संभव

आईसीएमआर के एक पूर्व वैज्ञानिक के मुताबिक, सामान्य रूप से वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया लंबी होती है। एक वैक्सीन को बनाने में कुछ महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक का समय लग सकता है।

इसके लिए ह्यूमन ट्रायल को स्टेज 1, 2 और 3 से होकर गुजरना होता है। लेकिन आपात स्थिति को देखते हुए नियमों में कुछ छूट देते हुए स्टेज 1 और दो या स्टेज दो और तीन को एक साथ करने की अनुमति दे दी जाती है।

किसी भी दवा/वैक्सीन को बाजार में लाने से पहले एथिक्स कमेटी से भी अनुमति लेना अनिवार्य होता है, लेकिन आपात स्थिति में इन नियमों से भी छूट दे दी जाती है। 

वैज्ञानिक के मुताबिक, पहले वैक्सीन को विकसित करने में बहुत अधिक समय लगता था, लेकिन अब इस प्रक्रिया में भी तकनीक का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है।

हमें वायरस की सेक्वेंसिंग का पता चल चुका है, ऐसे में केवल कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जरिये दवाओं के संभावित असर का कुछ आकलन कर लिया जा सकता है। इससे परीक्षण के दौरान समय की बचत हो जाती है।

सामान्य स्वस्थ मानव पर इस वैक्सीन का प्रयोग कर यह जांच की जाती है कि क्या वैक्सीन देने के बाद संबंधित बीमारी (यहां कोरोना) से लड़ने से संबंधित एंटीबॉडीज का निर्माण हो रहा है या नहीं।

इस प्रक्रिया से बने एंटीबॉडीज का कोरोना से स्वस्थ हुए मरीजों के अंदर बने एंटीबॉडीज से मिलान किया जाता है। उचित साम्यता पाए जाने पर नियमों का पालन करते हुए इसे वैक्सीन की संज्ञा दे दी जाती है।

ये सभी ट्रायल डबल ब्लाइंड ट्रायल विधि के अनुसार किए जाते हैं, जिसमें परीक्षण प्रक्रिया में शामिल आधे लोगों को वैक्सीन दी जाती है, तो शेष आधे लोगों को वैक्सीन नहीं दी जाती, बल्कि उसकी जगह किसी सामान्य विटामिन जैसी दवा दे दी जाती है।

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इसके बाद परीक्षण के उपरांत दोनों  वर्गों के परिणामों का अध्ययन किया जाता है।   

जारी रहेगा असर का परीक्षण

बीमारी से लड़ने की जांच के बाद भी वैक्सीन के मानव शरीर पर संभावित नकारात्मक असर का अध्ययन किया जाता है। इसके लिए वैक्सीन देने के कुछ समय बाद तक भी व्यक्ति की स्वास्थ्य रिपोर्ट ली जाती है।  

 

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