आईसीएमआर के एक पूर्व वैज्ञानिक के मुताबिक, सामान्य रूप से वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया लंबी होती है। एक वैक्सीन को बनाने में कुछ महीनों से लेकर कुछ वर्षों तक का समय लग सकता है।
इसके लिए ह्यूमन ट्रायल को स्टेज 1, 2 और 3 से होकर गुजरना होता है। लेकिन आपात स्थिति को देखते हुए नियमों में कुछ छूट देते हुए स्टेज 1 और दो या स्टेज दो और तीन को एक साथ करने की अनुमति दे दी जाती है।
किसी भी दवा/वैक्सीन को बाजार में लाने से पहले एथिक्स कमेटी से भी अनुमति लेना अनिवार्य होता है, लेकिन आपात स्थिति में इन नियमों से भी छूट दे दी जाती है।
वैज्ञानिक के मुताबिक, पहले वैक्सीन को विकसित करने में बहुत अधिक समय लगता था, लेकिन अब इस प्रक्रिया में भी तकनीक का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है।
हमें वायरस की सेक्वेंसिंग का पता चल चुका है, ऐसे में केवल कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के जरिये दवाओं के संभावित असर का कुछ आकलन कर लिया जा सकता है। इससे परीक्षण के दौरान समय की बचत हो जाती है।
सामान्य स्वस्थ मानव पर इस वैक्सीन का प्रयोग कर यह जांच की जाती है कि क्या वैक्सीन देने के बाद संबंधित बीमारी (यहां कोरोना) से लड़ने से संबंधित एंटीबॉडीज का निर्माण हो रहा है या नहीं।
इस प्रक्रिया से बने एंटीबॉडीज का कोरोना से स्वस्थ हुए मरीजों के अंदर बने एंटीबॉडीज से मिलान किया जाता है। उचित साम्यता पाए जाने पर नियमों का पालन करते हुए इसे वैक्सीन की संज्ञा दे दी जाती है।
ये सभी ट्रायल डबल ब्लाइंड ट्रायल विधि के अनुसार किए जाते हैं, जिसमें परीक्षण प्रक्रिया में शामिल आधे लोगों को वैक्सीन दी जाती है, तो शेष आधे लोगों को वैक्सीन नहीं दी जाती, बल्कि उसकी जगह किसी सामान्य विटामिन जैसी दवा दे दी जाती है।
बीमारी से लड़ने की जांच के बाद भी वैक्सीन के मानव शरीर पर संभावित नकारात्मक असर का अध्ययन किया जाता है। इसके लिए वैक्सीन देने के कुछ समय बाद तक भी व्यक्ति की स्वास्थ्य रिपोर्ट ली जाती है।