2012 में भारतीय मूल की महिला सविता हलप्पनवार की मौत के बाद से लगातार यह विवाद का मामला बना रहा और इस वर्ष यह बड़े आंदोलन में बदल गया। इस विषय पर हुए जनमत संग्रह में 66 फीसदी लोगों ने 8वें संशोधन के तहत संविधान में शामिल किए गए गर्भपात निषेध कानून को निरस्त करने की राय जाहिर की।
6 दिसंबर, 2018 को आयरलैंड की संसद में गर्भपात की इजाजत देने वाले कानून को मंजूरी दी गई। नए कानून के अनुसार, गर्भपात स्वास्थ्य सेवाओं के एक हिस्से के तौर पर होगा। हालांकि नए कानून के तहत 12 हफ्ते तक ही गर्भपात की इजाजत दी गई है। सविता हलप्पनवार ने साहस के साथ इस कानून के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। मौत के बाद वह इस आंदोलन का चेहरा बनीं और आखिरकार कामयाबी मिली।