पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नोटबंदी को लेकर केंद्र सरकार पर एक के बाद एक हमले कर रही हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ा चेहरा ममता आजकल दिल्ली, यूपी और बिहार की गलियों में केंद्र सरकार को घेरने की रणनीति बना रही हैं, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जो ममता बनर्जी मोदी सरकार को गिराने की कसम खा चुकी हैं उन्हें विपक्ष का कितना साथ मिल रहा है?
कोलकात्ता से दिल्ली और दिल्ली से लखनऊ और पटना तक ममता रैलियां कर रही हैं। इन सभी राज्यों में गैर बीजेपी दलों की सरकारें हैं। लेकिन कोई भी मुख्यमंत्री ममता के साथ सार्वजनिक तौर पर दिखना नहीं चाहता है।
नोटबंदी के बाद ममता बनर्जी दिल्ली, लखनऊ और पटना पहुंची। इन तीनों ही राज्यों में गैर बीजेपी दलों की सरकारें हैं। ममता इन राज्यों में जहां-जहां गईं इनके मुख्यमंत्रियों ने सार्वजनिक रुप से ममता के साथ मंच शेयर करने से दूरी बनाई।
इसकी शुरुआत दिल्ली से हुई। नोट बंदी के विरोध में ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति भवन तक पैदल मार्च किया। इस मार्च में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शामिल होना था, लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने इस कार्यक्रम से दूरी बना ली। अपनी जगह उन्होंने मनीष सिसौदिया को इस पैदल मार्च में भेज दिया।
अखिलेश का ममता की लखनऊ रैली में न पहुंचना प्रश्न उठाता है
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नोटबंदी का विरोध सपा भी कर रही है। मुलायम सिंह यादव और यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दोनों ही हर रोज नोटबंदी के विरोध में बयान देते रहे हैं। इसी के भरोसे ममता बनर्जी ने लखनऊ में नोटबंदी के विरोध में एक बड़ी रैली प्लान कर ली।
इस रैली में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पहुंचने वाले थे लेकिन अहम वक्त में उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए और रैली ममता बनर्जी को अकेले करनी पड़ी।
लखनऊ की यह रैली यूपी सरकार के खर्चे पर हुई। सपा के कार्यकर्ता रैली में सक्रिय रुप में दिखे, लेकिन ऐन मौके पर अखिलेश यादव के ना आने पर उन्हें निराशा हुई। मअखिलेश यादव की रैली में अनुपस्थिति विपक्ष की एकजुटता पर प्रश्न खड़े करती है। एक तरह से देखा जाए तो यह ममता के साथ 'धोखा' है।
खबरें तो यहां तक आ रहीं हैं कि अखिलेश को खुद मुलायम सिंह यादव ने रैली में जाने से रोका। क्योंकि मुलायम सिंह को लगता है कि ममता के साथ अखिलेश का मंच साझा करना किसी नए राजनीतिक समीकरण को हवा दे सकता है।
अखिलेश के बाद लालू ने किया किनारा
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यूपी के बाद बिहार में केंद्र सरकार के खिलाफ समर्थन हासिल करने गईं ममता ने 30 नवंबर को पटना में रैली कर मोदी सरकार को अड़े हाथों लिया। लेकिन ज्ञात हो की बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही नोटबंदी को अपना समर्थन दे चुके हैं और ममता की रैली से ठीक पहले लालू प्रसाद यादव ने भी नोटबंदी के पीएम मोदी के फैसले का समर्थन कर दिया।
अब ऐसे में ममता बिना लालू-नीतीश के बिहार का किला फतेह करने से रहीं। पटना रैली से एक दिन पहले ममता ने लालू से मुलाकात की थी। तब तक लालू ने नोटबंदी का समर्थन नहीं किया था। बुधवार को पटना में हुई रैली में लालू प्रसाद यादव भी नहीं पहुंचे।
नीतिश ने ममता के साथ मंच शेयर न करने पर एक संवैधानिक बहाना दिया। उन्होंने कहा कि जिस कानून पर राष्ट्रपति हस्ताक्षर कर चुके हों उसका विरोध करना गलत होगा।
अन्ना भी बना चुके हैं दूरी
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राजनीतिक दल ही नहीं भष्ट्राचार के विरोध का एक समय चेहरा रहे अन्ना हजारे भी ममता को ऐन मौके पर 'धोखा' दे चुके हैं।
12 मार्च 2014 को दिल्ली के रामलीला मैदान पर ममता बनर्जी की रैली हुई जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे नहीं पहुंचे, जबकि रैली से पहले खुद अन्ना हजारे ने इस बात की पुष्टि की थी कि वे इस रैली में जाएंगे। बाद में कहा गया कि अन्ना की तबियत ठीक नहीं थी।
अन्ना के रैली में न पहुंचने से भीड़ भी कम रही। उस समय तो भाजपा सत्ता में नहीं थी और विपक्ष तितर-बितर था, लेकिन अब जब केंद्र में भाजपा सत्ता में है और लगभग पूरा विपक्ष एकजुट है तो क्या ममता बनर्जी विपक्ष की इस एकजुटता का फायदा अपनी कसम पूरी करने के लिए उठा पाएंगी।
दरअसल तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने हाल ही में एक रैली में कसम खाई थी कि वे मोदी को राजनीति से बेदखल कर देंगी। उन्होंने कहा था 'मैं प्रतिज्ञा लेती हूं कि नरेंद्र मोदी को भारतीय राजनीति से बेदखल करके रहूंगी या फिर मर जाऊंगी'।