पश्चिम बंगाल की राजनीति में घुमावदार मोड़ आया है। तृणमूल कांग्रेस ने सीपीआई (एम) पर काफी दबाव बनाया। नतीजतन सीपीआई (एम) के नेताओं ने तृणमूल को हराने के लिए भाजपा का दामन थाम लिया। इसके कारण 2014 के चुनाव में 30 फीसदी वोट पाने वाली सीपीएम (आई) को 2019 में केवल 6 फीसदी वोट मिले।
हालांकि तृणमूल को 2014 के मुकाबले 4 फीसदी वोट ज्यादा मिले। वह 39 से 43 फीसदी वोट पाने में सफल रही, लेकिन भाजपा के वोटों में अप्रत्याशित इजाफा हुआ। यहां तक कि भाजपा माल्दा जैसे करीब 52 प्रतिशत वाले मुस्लिम बाहुल इलाके में एक सीट जीत गई और दूसरी केवल 8222 मतों से हारी है।
यह नतीजा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हजम नहीं हो रहा है। क्योंकि माल्दा में केवल 48 फीसदी वोट हिंदुओं के हैं और भाजपा 36 फीसदी वोट पाने में सफल रही। इस तरह से सांप्रदायिक बंटवारा करके भाजपा ने तृणमूल को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
मुकाबले में ममता बनर्जी बेहद आक्रामक होती जा रही हैं। वह जयश्री राम के नारे से लेकर भगवा रंग तक से परहेज करने लगी हैं। मुख्यमंत्री के इस रुख पर भाजपा ने केंद्र में नई सरकार बनने के बाद चारों तरफ से शिकंजा कसना आरंभ कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय भी पश्चिम बंगाल को लेकर लगातार संवेदनशील है।
राज्य में केशरी नाथ त्रिपाठी राज्यपाल हैं। कानूनविद् हैं। महामहिम को केंद्र सरकार की शक्तियों और राज्य सरकार की सीमाओं की ढंग से जानकारी है। राज्य में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं। भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं में शीर्ष स्तर से लेकर गांव और ब्लाक के स्तर पर टकराव की स्थिति है। 2019 में 26, 2017-18 में 96 राजनीतिक कार्यकर्ता मारे गए। केंद्र ने राज्य सरकार से वहां हिंसा के हालात को लेकर रिपोर्ट मांगी है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस तरह से राज्य सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू किया है। लेकिन माना जा रहा है कि न तो भाजपा के महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय और न ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह राज्य सरकार को बर्खास्त करके ममता बनर्जी को कोई सहानुभूति का लाभ देने के पक्ष में हैं।
इसलिए भविष्य में राज्य सरकार पर केंद्र का लगातार दबाव बना रहेगा, लेकिन सरकार के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने के संकेत कम हैं। 2021 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है और इससे पहले भाजपा वहां पूरी जमीन तैयार कर लेना चाहती है।