वह जल्द ही अमेरिकी टेलीविजन पर जाना-पहचाना चेहरा बन गए। वह पश्चिम में इजरायल की बात बड़ी मुखरता से रखने लगे थे। आगे चलकर नेतन्याहू को 1984 में न्यूयॉर्क में यूएन में इजरायल का स्थायी प्रतिनिधि बना दिया गया। 1998 में जब वह इजरायल वापस आए तो देश की राजनीति में दस्तक दी। उन्होंने संसदीय चुनाव जीता और उप विदेश मंत्री बने। राजनीतिक रूप से बेंजामिन नेतन्याहू ख़ुद को दक्षिणपंथी बताते हैं।
1992 के आम चुनाव में लिकुड पार्टी की जब हार हुई तो उन्हें पार्टी का चेयरमैन बनाया गया। 1996 में इजरायल के राष्ट्रपति शिमोन पेरेज ने प्रधानमंत्री यित्ज़ाक रॉबिन की हत्या के बाद वक़्त से पहले चुनाव की घोषणा की थी। इस चुनाव में नेतन्याहू को सीधी जीत मिली और वह इजरायल के प्रधामंत्री बने। नेतन्याहू इजरायल के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने और वह इस मामले में भी एकलौते हैं कि उनका जन्म 1948 में इजरायल के जन्म बाद हुआ था।
नेतन्याहू का पहला कार्यकाल छोटा रहा लेकिन काफी नाटकीय था। इजरायल और फ़लस्तीनियों के बीच ओस्लो एकॉर्ड्स समझौते की तीखी आलोचना के बावजूद 1997 में नेतन्याहू ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया जिसमें हेब्रोन का 80 फ़ीसदी नियंत्रण फलस्तीनियों को देना था। इसके साथ ही उन्होंने 1998 में वाई रिवर मेमोरेंडम पर भी हस्ताक्षर किया जिससे पश्चिमी बैंक से अधिक निकासी का रास्ता साफ हुआ।
1999 में नेतन्याहू ने 17 महीने पहले चुनाव की घोषणा कर दी और इसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उन्हें लेबर नेता एहुद बराक से हार मिली थी। पूर्व कमांडर नेतन्याहू ने एक स्थायी शांति समझौते का वादा किया और उन्होंने दक्षिणी लेबनान से भी वापसी की बात कही।
benjamin netanyahu, Israel PM
चुनाव हारने के बाद नेतन्याहू ने संसदीय सदस्य और लिकुड पार्टी के चेयरमैन से इस्तीफा दे दिया। नेतन्याहू लिकुड पार्टी में एरियल शरोन के उत्तराधिकारी बने थे। 2001 में जब शरोन प्रधानमंत्री बने तो फिर से नेतन्याहू की सरकार में वापसी हुई। इस सरकार में वह पहले विदेश मंत्री बने और फिर बाद में वित्त मंत्री बने।
2005 में उन्होंने ग़ज़ा पट्टी से सैनिकों की वापसी के फ़ैसले पर विरोध के कारण इस्तीफा दे दिया। 2005 में एक बार फिर से नेतन्याहू को मौक़ा मिला। तब शरोन बड़े स्ट्रोक की चपेट में आ गए थे और उन्हें कोमा में भर्ती करना पड़ा था। लिकुड पार्टी में मतभेद उभरा और वह दो फाड़ हो गई।
नेतन्याहू ने लिकुड पार्टी का नेतृत्व जीता और वह शरोन के उत्तराधिकारी एहुद ओलमर्ट के कड़े आलोचक के रूप में सामने आए। मार्च 2009 में नेतन्याहू ने दूसरी बार चुनाव जीता। नेतन्याहू ने दक्षिणपंथ, राष्ट्रवादी और धार्मिक पार्टियों को मिलाकर एक गठजोड़ तैयार किया। नेतन्याहू सरकार की अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आलोचना हुई। यह आलोचना फ़लस्तीनियों के साथ शांतिवार्त नहीं बहाल करने की वजह से हुई।
नेतन्याहू ने सार्वजनिक रूप से बिना सैनिकों के फ़लस्तीनी स्टेट की अवधारणा को स्वीकार किया लेकिन उन्होंने कहा कि फ़लस्तीनियों को इसराइल को एक यहूदी मुल्क को रूप में कबूल करना होगा। 2015 में नेतन्याहू ने फ़लस्तीनियों के लिए एक देश की संभावना से ख़ुद को अलग कर लिया। उन्होंने कहा कि मध्य-पूर्व में इस्लामिक चरमपंथ जिस तरह से आगे बढ़ रहा है वैसे में इसकी संभावना खत्म हो गई है। 2012 के आख़िर में नेतन्याहू ने वक़्त से पहले चुनाव की घोषणा कर दी और कुछ हफ़्तों में ही संसद को भंग कर दिया गया। इसके बाद नेतन्याहू ने ग़ज़ा में चरमपंथियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई का आदेश दिया। उन्होंने ऐसा इसराइल में एक रॉकेट फायरिंग के बाद आदेश दिया था।
नेतन्याहू ने ग़जा में यह ऑपरेशन बिना ज़मीन पर सेना उतारे अंजाम दिया था। आठ दिनों के इस ऑपरेशन की सफलता की दुनिया भर में प्रशंसा हुई। जुलाई 2014 में एक बार ने नेतन्याहू ने ग़जा में एक बड़ा ऑपरेशन चलाया।
50 दिनों की इस लड़ाई में 21 सौ से ज़्यादा फलस्तीनियों की मौत हुई। फलस्तीन में यूएन के अधिकारियों के मुताबिक इनमें से ज़्यादातर आम नागरिक थे। इजरायल की तरफ से 67 सैनिक और 6 आम नागरिक मारे गए। संघर्ष के दौरान इजरायल को अमरीका का समर्थन हासिल रहा है। लेकिन नेतन्याहू और तत्तकालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के संबंध ठीक नहीं थे। ऐसा नेतन्याहू के तीसरे कार्यकाल से ही होने लगा था।
2015 में जब नेतन्याहू ने अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित किया तो ओबामा से संबंध और निचले स्तर पर पहुंच गया था। ओबामा ने ईरान के साथ जो परमाणु समझौता किया था उसकी नेतन्याहू ने कड़ी आलोचना की। जब अमरीका में सत्ता परिवर्तन हुआ तो फिर इजरायल और अमेरिका के संबंध मधुर हुए। मोदी और नेतन्याहू की दोस्ती कहां तक जाती है यह आने वाले वक़्त में जगजाहिर हो जाएगा लेकिन पिछले 25 सालों से दोनों देशों के बीच के राजनयिक संबध को निश्चित तौर पर गति मिली है।