वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव से लोगों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी माह में दिल्ली सरकार को स्मॉग टॉवर लगाने के निर्देश दिए थे। इस निर्देश का पालन करते हुए दिल्ली सरकार ने कनॉट प्लेस में एक स्मॉग टॉवर लगाने का निर्णय किया है। इससे राजधानी के दिल कनॉट प्लेस घूमने आने वालों को साफ-सुधरी हवा मिल सकेगी। दिल्ली सरकार का दावा है कि यह चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मॉग टॉवर होगा जो अलग तकनीकी से काम करेगा।
दूसरा स्मॉग टॉवर केंद्र सरकार के सहयोग से दिल्ली के सबसे ज्यादा प्रदूषित क्षेत्रों में से एक आनंद विहार में स्थापित किया जाएगा।
कितने कारगर हैं स्मॉग टॉवर
पर्यावरण विशेषज्ञ तरुण ठाकुर के मुताबिक लगभग 20 मीटर (65 फीट लगभग) ऊंचाई वाले स्मॉग टॉवर भारी पंखों से आसपास के धूल कणों को अपने अंदर खींचते हैं और उन्हें रिफाइन कर दूसरे सिरे से साफ वायु बाहर फेंकते हैं जिससे लोगों को साफ हवा प्राप्त होती है। ये सबसे ज्यादा पीएम-10 और पीएम-2.5 धूल कणों को साफ करने का काम करते हैं जो नाक के जरिए लोगों के फेफड़ों तक पहुंचकर उन्हें बीमार बनाता है।
तरुण ठाकुर के मुताबिक. लेकिन यह नहीं समझना चाहिए कि स्मॉग टॉवर लगाने से हवा पूरी तरह शुद्ध हो जाती है। दरअसल, यह लगभग 50 फीसदी वायु प्रदूषण को ही कम करती है। लेकिन उच्च गुणवत्ता के एयर फिल्टर अगर बंद वातावरण में काम करते हैं तब उनकी क्षमता ज्यादा होती है। सामान्य तौर पर स्मॉग टॉवर लगभग 50 फीसदी पीएम 10 और लगभग एक तिहाई पीएम 2.5 धूल कणों को सोखने की क्षमता रखते हैं।
शांत वायु में यह अपने कम से कम 20 मीटर आसपास की वायु से धूल कण सोखकर उन्हें साफ हवा में बदल देते हैं। इन टॉवरों से निकलने वाली साफ हवा हवा के बहाव की दिशा में लगभग एक किलोमीटर और हवा के बहाव के विरुद्ध लगभग 200 मीटर तक शुद्ध कर देते हैं।
वृक्ष ही सबसे बड़े एयर फिल्टर
विशेषज्ञों के मुताबिक स्मॉग टॉवर वायु प्रदूषण के अन्य संघटकों जैसे कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड और ओजोन जैसी गैसों के बारे में बिल्कुल काम नहीं करते हैं। ऐसे में वृक्ष ही हमारे सबसे बड़े स्मॉग टॉवर साबित हो सकते हैं जो इन सभी हानिकारक गैसों को एक साथ फिल्टर करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए कृत्रिम उपायों को अपनाने की बजाय ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण ही लोगों को स्वच्छ वायु दे सकता है।