कर्नाटक में होने वाले चुनावों से तकरीबन तीन महीने पहले कांग्रेस ने रायपुर में राष्ट्रीय अधिवेशन किया था। इस राष्ट्रीय अधिवेशन में कर्नाटक में होने वाले चुनावों को लेकर एक ऐसी स्ट्रैटजी तैयार की थी, जिस पर कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में मतदान के दिन तक कायम रही। कर्नाटक के चुनाव में इसी फार्मूले के आधार पर अपना मैनिफेस्टो भी तैयार किया था। आने वाले दिनों में इसी योजना के अनुरूप ही कांग्रेस न सिर्फ विधानसभा बल्कि लोकसभा के चुनाव भी लड़ेगी। ऐसी स्ट्रेटजी तैयार करने वालो में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के अध्यक्ष, पूर्व रेल मंत्री और पार्टी के कोषाध्यक्ष पवन बंसल ने अमर उजाला डॉट कॉम से विशेष बातचीत की। उन्होंने कहा कि कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस की जीत में पार्टी के सभी प्रमुख नेता और कार्यकर्ताओं की भूमिका रही है। प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की आपस में तुलना करना बिल्कुल ठीक नहीं है।
सवाल: कर्नाटक में कांग्रेस की वापसी हो गई, अनुमान था कि यही नतीजे आएंगे?
जवाब: बिल्कुल जैसी उम्मीद थी वैसे ही परिणाम आए हैं। कर्नाटक में कांग्रेस ने जिस "फार्मूले" के साथ चुनाव लड़ा है वह जनता के सबसे करीब था। यही वजह है कि चुनाव परिणाम वही है जिसकी उम्मीद थी।
सवाल: ऐसी कौन सी "स्ट्रेटजी या फार्मूला" बनाया था आपने?
जवाब: कर्नाटक के चुनाव से कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का एक राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ था। अधिवेशन में कर्नाटक के चुनावों को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। इसी अधिवेशन में तय हुआ था कि चुनाव में हमारी जो भी कार्य योजनाएं या रणनीतियां होगी वह जनता के इर्द-गिर्द घूमने वाली ही होगी। तो चुनाव लड़ने और जनता के बीच जाने के लिए जो फार्मूला तैयार किया वह जनता की ही जरूरतों और उनकी समस्याओं को दूर करने के लिहाज से बनया गया। हमारा मैनिफेस्टो भी उसी आधार पर तैयार हुआ था।
सवाल: आपके मैनिफेस्टो में तो बजरंग दल पर सख्ती और प्रतिबंध जैसे न जाने क्या क्या मुद्दे शामिल हो गए थे। आपके मैनिफेस्टो के बाद ही तो कर्नाटक में बजरंगबली की एंट्री हो गई। तो बजरंगबली कहां से जनता के मुद्दे हो गए?
जवाब: बजरंग दल और बजरंगबली में अंतर है। भारतीय जनता पार्टी अगर बजरंग दल को बजरंगबली से जोड़कर दुष्प्रचार करना शुरू कर देगी तो उनको क्या लगता है वह चुनाव जीत जाएंगे। हमारे मैनिफेस्टो में तो एक संगठन पर सख्ती या उस पर बारीकी से नजर बनाने की बात थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उसको बजरंगबली से जोड़ दिया।
सवाल: लेकिन कर्नाटक के चुनाव में बजरंगबली का मुद्दा अगर भारतीय जनता पार्टी ने बनाया तो आपने भी तो उसको खूब बढ़ाया। आपने कहा कि हम इतने मंदिर बनवा देंगे हनुमान जी के?
जवाब: कांग्रेस कभी धर्म के आधार पर न कोई सियासी मुद्दा बनाती है और न उसको आगे बढ़ाती है। रही बात बजरंगबली की तो अब बजरंगबली कोई भारतीय जनता पार्टी की प्रॉपर्टी तो हैं नहीं। सभी लोग उनकी पूजा करते हैं। आस्था रखते हैं।
सवाल: तो आप मानते हैं कर्नाटक में जो चुनाव परिणाम आए हैं उसने स्थानीय मुद्दे ही हावी रहे। और जाति धर्म किनारे हो गए?
जवाब: आप स्वयं देखिए। चुनाव परिणाम क्या बता रहे हैं। हमने तो जनता के मुद्दे ही जनता के सामने रखे। फिर हमारे नेताओं ने जनता के बीच जाकर उनसे इन मुद्दों और अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए मतदान करने की अपील की। कर्नाटक के लोगों को पता है कि भारतीय जनता पार्टी के झूठे जाति धर्म और हिंदुत्व के एजेंडे में फस कर राज्य का विकास नहीं हो सकता। इसीलिए उन्होंने कांग्रेस को स्थानीय मुद्दे और उनकी समस्याओं को दूर करने के लिहाज से ही बढ़-चढ़कर वोट दिया।
सवाल: कर्नाटक के तुरंत बाद मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ राजस्थान तेलंगाना और फिर लोकसभा मतदान चुनाव होने हैं। इन राज्यों के चुनाव में चुनौतियां ज्यादा नजर आती हैं आपके लिए या कर्नाटक के नतीजों से राहें आसान लग रहीं हैं?
जवाब: देखिए जितनी मेहनत कांग्रेस के एक-एक नेता और कार्यकर्ता ने कर्नाटक में की है। इतनी ही मेहनत आगे आने वाले विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में हमें करनी है। हम आने वाले चुनावों में भी स्थानीय मुद्दों और लोगों मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं और जरूरतों की चीजों को पूरा करने के लिए एक भरोसे के साथ जनता के बीच में जाएंगे। कर्नाटक के चुनाव ने साबित कर दिया की सिर्फ एक नेता के चेहरे के दम पर चुनाव नहीं जीता जाता। भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के चेहरे और ध्रुवीकरण की राजनीति करके लोगों को बरगलाया था।
सवाल: यह कहना कि सिर्फ एक चेहरे के दम पर चुनाव नहीं जीता जाता तो कांग्रेस पार्टी ने भी तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का चेहरा आगे रखा था?
जवाब: नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जितना कर्नाटक में घूमे हैं उतना ही कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कांग्रेस की पूरी राष्ट्रीय कार्यकारिणी भी कर्नाटक के चुनावी मैदान में जुटी थी। कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी से जुड़े सभी बड़े नेता और कार्यकर्ता इस सियासी मैदान में थे। भारतीय जनता पार्टी तो सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव जीतने का दावा कर रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब कर्नाटक में जाते थे तो सिर्फ ध्रुवीकरण की ही बात करते थे।
सवाल: अगर कर्नाटक के चुनाव में स्थानीय मुद्दे हावी रहे और आपकी पार्टी ने उन मुद्दों को आगे करके चुनाव लड़ा। तो राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का इस चुनाव में कोई असर माना जाएगा या नहीं?
जवाब: राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा किसी चुनावी मकसद से नहीं की थी। लेकिन उनकी भारत जोड़ो यात्रा के पीछे जो मकसद था यही सब जनता के मुद्दों को लेकर के था। महंगाई भ्रष्टाचार बेरोजगारी समेत देश प्रदेश में बढ़ रहे आपसी भेदभाव को दूर करने के लिए था। और लोकतंत्र में जब ऐसे आंदोलन होते हैं तो चुनावों में जनता एक एक चीज का हिसाब किताब रखकर वोट देने जाती है।
सवाल: एक सीधा सवाल और उसका सीधा जवाब दीजिए। कर्नाटक के चुनाव प्रियंका गांधी और राहुल गांधी में किसका सबसे ज्यादा और अहम रोल रहा?
जवाब: देखिए, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का आप कंपैरिजन नहीं सकते। मुझे नहीं पता आप यह किस भाव से पूछ रहे हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि कर्नाटक के चुनाव में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी समेत सभी बड़े नेताओं का सौ फ़ीसदी योगदान रहा है।
सवाल: आपको लगता है कि हिमाचल चुनाव के बाद प्रियंका गांधी ने कर्नाटक में भी खूब जनसभाएं की और लोगों से मिलीं। तो आने वाले दिनों में उनके पास कोई और बड़ी भूमिका या जम्मेदारी होगी?
जवाब: प्रियंका गांधी अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका और बड़े रोल में ही हैं। वह पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव हैं। आने वाले चुनावों में पार्टी के सभी बड़े नेता इसी तरह से अपना योगदान देकर चुनावों में कांग्रेस का परचम लहराएंगे।