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गलवां घाटी में हुई हिंसक झड़प में बिहार रेजीमेंट के सैनिकों ने दिया था अद्भुत साहस का परिचय

Thu, 18 Jun 2020 08:24 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

15 जून की रात को उत्तरी लद्दाख के गलवां घाटी क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हुई भारतीय और चीनी सैनिकों की भिड़ंत में भारतीय सेना की बिहार रेजीमेंट ने गजब का साहस दिखाया था। बिहार रेजीमेंट के सैनिकों ने अपने फर्ज का परिचय देते हुए चीनी सैनिकों को यह अहसास दिया दिया कि हम किसी भी स्थिति में पीछे हटने वाले नहीं हैं। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि झड़प के दौरान लगभग आधे भारतीय सैनिक मारे गए लेकिन, उन्होंने अंतिम समय तक वीरता से लड़ाई लड़ी। 
 
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शहीद हुए बिहार रेजीमेंट के जवानों का पार्थिव शरीर ले जाते जवान - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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चीनी सैनिकों से शांति से बात करने गए भारतीय कमांडिंग अधिकारी पर उन्होंने जब हमला किया, तो चीनियों को लगा कि अब भारतीय सैनिक अपने अधिकारी को गिरता देख डर के मारे वहां से भाग जाएंगे। लेकिन चीनियों की यह सोच महज गलतफहमी साबित हुई। इसके बदले उन्हें भारतीय सैनिकों के गुस्से और प्रतिकार का सामना करना पड़ा। भारतीय सैनिकों ने चीनियों की ज्यादा संख्या होने के बावजूद उन्हें करारा जवाब दिया। 

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हथियार होने के बावजूद नियमों का ध्यान रखते हुए बिहार रेजीमेंट के जवानों ने खाली हाथ चीनी सैनिकों का मुकाबला किया। घंटों चली इस झड़प में दोनों पक्षों की ओर से कई सैनिकों की जान गई। अमेरिकी इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक इस झड़प में चीन के 30 सैनिक और एक कमांडिंग अधिकारी भी मारा गया। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने गुरुवार को स्पष्ट क्या कि इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय सैनिकों ने बहादुरी से चीनियों को जवाब दिया और अंत तक डटे रहे। 

शहीद हुए 20 जवानों में बिहार रेजीमेंट के 12 सैनिक

सेना की ओर से जारी शहीदों की सूची के मुताबिक 20 में से 12 सैनिक बिहार रेजीमेंट के थे। इस झड़प में बिहार रेजीमेंट के कमांडिंग अधिकारी कर्नल बी संतोष बाबू और जूनियर कमांडिंग अधिकारी कुंदन कुमार झा शहीद हो गए। इनके अलावा सिपाही अमन कुमार, चंदन कुमार, दीपक कुमार, गणेश कुंजाम, गणेश राम, केके ओझा, राजेश ओरांव, सीके प्रधान, नायब सूबेदार नंदूराम और हवलदार सुनील कुमार ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। 
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इसलिए हुई है सीमा पर बिहार रेजीमेंट की तैनाती

बिहार रेजीमेंट का शौर्य ऐतिहासिक है। यह रेजीमेंट भारतीय सेना के एक मजबूत अंग है। कहा जाता है कि बिहार रेजीमेंट के जवानों का प्रशिक्षण ऐसा होता है कि वह किसी भी स्थिति में रह सकते हैं। इसीलिए दुर्गम और जटिल परिस्थितियों में इन्हें तैनात किया जाता है और इसीलिए इन्हें एलएसी पर तैनात किया गया है। यह रेजीमेंट भारतीय सेना की सबसे पुरानी पैदल सेना रेजीमेंट में से एक है। इसका गठन साल 1941 में किया गया था। 

करगिल युद्ध में भी भारत की जीत के पीछे बिहार रेजीमेंट के जवानों का बड़ा योगदान था। जुलाई 1999 में बटालिक सेक्टरे प्वाइंट 4268 और जुबर रिज पर जब पाक घुसपैठियों ने कब्जा करने की नापाक कोशिश की तो उन्हें खदेड़ने वाले बिहार रेजीमेंट के ही जवान थे। इसके साथ ही 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उरी में पाक घुसपैठियों से भी इसी रेजीमेंट ने लोहा लिया था। इस दौरान रेजीमेंट के 15 जवान शहीद हुए थे। 
 
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