टेक कंपनियां इस क्षेत्र के लिए नई तकनीकें कर रही विकसित
लार्ज लैंग्वेज मॉडल और जनरेटिव एआई जैसी नई तकनीकों ने दवा बनाने की रिसर्च के कई चरणों में नई संभावनाएं पैदा की हैं। एआई बड़ी मात्रा में वैज्ञानिक डाटा का विश्लेषण करके बीमारी से जुड़े संभावित टारगेट पहचानने, नए ड्रग कैंडिडेट खोजने और उनके संभावित असर का अनुमान लगाने में वैज्ञानिकों की मदद कर सकता है। इसका इस्तेमाल सिर्फ दवा खोजने तक सीमित नहीं है। बीमारी के टारगेट की पहचान से लेकर ड्रग डिस्कवरी, प्री-क्लिनिकल रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल और बाजार में दवा आने के बाद उसकी निगरानी तक अलग-अलग चरणों में एआई की भूमिका बढ़ रही है।
दवा की खोज और उसे विकसित करने के काम में एआई का इस्तेमाल आने वाले समय में और तेजी से बढ़ सकता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियां इस क्षेत्र के लिए नई तकनीकें विकसित कर रही हैं। एनवीडिया के शक्तिशाली जीपीयू और एआई फ्रेमवर्क वैज्ञानिकों को बड़ी मात्रा में डाटा और जटिल कैलकुलेशन को तेजी से प्रोसेस करने में मदद कर रहे हैं। इससे संभावित दवाओं की पहचान और उनकी जांच का काम पहले के मुकाबले ज्यादा तेजी से किया जा सकता है।
वहीं गूगल हेल्थ मशीन लर्निंग और डाटा विश्लेषण का इस्तेमाल करके बीमारी और मरीजों से जुड़े डाटा के आधार पर बेहतर अनुमान लगाने की दिशा में काम कर रहा है। एपल हेल्थ अपने हेल्थ डाटा इकोसिस्टम के जरिए लोगों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को एक जगह उपलब्ध कराने और रियल-टाइम हेल्थ मॉनिटरिंग जैसी संभावनाओं को बढ़ावा दे रहा है।
इसके अलावा दूसरी ओर ओपनएआई के लार्ज लैंग्वेज मॉडल वैज्ञानिकों को बड़ी मात्रा में रिसर्च पेपर और वैज्ञानिक जानकारी समझने, नए सवाल तैयार करने और संभावित शोध विचारों पर काम करने में मदद कर सकते हैं। इन सभी तकनीकों का उद्देश्य दवा विकसित करने की पूरी प्रक्रिया को ज्यादा तेज और व्यवस्थित बनाना है। अगर इनका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, तो भविष्य में दवा खोजने में लगने वाला समय और खर्च कम हो सकता है और मरीजों के लिए ज्यादा सटीक इलाज विकसित करने में मदद मिल सकती है।