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एआई: दवाओं की खोज में एआई की बढ़ती भूमिका, क्या लाइलाज बीमारियों के लिए नई दवाएं खोज पाएंगे वैज्ञानिक?

Tue, 06 Oct 2026 07:39 AM IST
संकल्प प्रकाश सिंह स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

नई दवाओं की खोज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक एक बड़ी भूमिका निभा सकती है। इसकी मदद से कई ऐसी बीमारियों की दवाओं को ढूंढा जा सकता है, जिनका इलाज आज के समय मौजूद नहीं है। 
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AI In Drug Discovery - फोटो : Amar Ujala AI Generated
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विस्तार
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एआई की क्षमता में जिस तेजी से वृद्धि हो रही है, वह आने वाले समय में चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। आज के समय अल्जाइमर, AIDS, पार्किंस, टाइप-1 डायबिटीज जैसी कई बीमारियां हैं, जिनको पूरी तरह ठीक करने की दवाएं अभी तक नहीं हैं। हर साल बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु इन बीमारियों की वजह से होती है। वहीं दूसरी ओर एआई की क्षमता में तेजी से हो रहे विकास को देखते हुए कई रिसर्च पेपर में ये कहा जा रहा है कि आने वाले समय में एआई के जरिए ऐसी दवाओं की खोज की जा सकती है, जिनकी मदद से उन बीमारियों को ठीक किया जा सकता है जिनका इलाज अभी तक मौजूद नहीं है।  

दवाओं की खोज और रिसर्च में एआई का बढ़ता इस्तेमाल

नई दवा बनाना सिर्फ लैबोरेट्री में किसी कैमिकल को मिलाने और उसके असर को देखने भर का काम नहीं है। किसी नई दवा की खोज करने की प्रक्रिया में पिछले कई वर्षों की रिसर्च, हजारों प्रयोग और बहुत बड़ी लागत होती है। वैज्ञानिकों को पहले यह समझना पड़ता है कि बीमारी शरीर में किस तरह काम कर रही है फिर ऐसे अणु की तलाश करनी होती है जो उस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करने का काम कर सकें। यह करने के बाद उसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और इंसानी शरीर पर उसका क्या असर है? उसकी लंबी जांच शुरू होती है। 

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यहीं पूरी तस्वीर बदलने की कोशिश कर रहा है। एआई बड़ी मात्रा में वैज्ञानिक डाटा का कम समय में विश्वलेषण करके उसमें से जरूरी चीजों को खोज सकता है। इस दौरान एआई उन पैटर्न को पहचानने में मदद कर सकता है, जिन्हें इंसानों के लिए अब तक पहचानना काफी मुश्किल काम था। इससे वैज्ञानिक संभावित दवाओं, नए अणुओं और उनके संभावित असर की पहचान पहले के मुकाबले ज्यादा सटीकता और तेजी से कर सकते हैं।

हाल के वर्षों में एआई ने दवा खोजने के तरीके में काफी बदलाव लाना शुरू भी कर दिया है। अब इसका इस्तेमाल सिर्फ डाटा का विश्लेषण करने तक सीमित नहीं है। एआई की मदद से वैज्ञानिक प्रोटीन की संरचना को ज्यादा सटीक तरीके से समझने और संभावित दवा अणुओं को डिजाइन करने की कोशिश कर रहे हैं। छोटे अणुओं से लेकर बड़े जैविक अणुओं तक इनके डिजाइन और बेहतर बनाने में भी एआई का इस्तेमाल अब काफी बढ़ रहा है।
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इन सबके अलावा ऐसे कई बड़े एआई मॉडल विकसित किए गए हैं, जिनका इस्तेमाल प्रोटीन से जुड़ी जटिल बायोलॉजिकल जानकारी को समझने और दवा विकसित करने की प्रक्रिया में किया जा रहा है। यानी किसी बीमारी के लिए सही टारगेट चुनने से लेकर उस टारगेट पर असर करने वाले संभावित अणु खोजने तक। यानी दवा की खोज करने के कई चरणों में एआई की भूमिका बढ़ती जा रही है।

रिसर्च की लागत हो सकती है कम

अगर यह तकनीक लगातार बेहतर होती है, तो दवा की शुरुआती खोज में लगने वाला समय और रिसर्च की लागत कम हो सकती है। साथ ही वैज्ञानिक ऐसे अणुओं पर ज्यादा जल्दी ध्यान दे सकते हैं जिनके सुरक्षित और प्रभावी होने की संभावना बेहतर हो। हालांकि, एआई के कंप्यूटर आधारित अनुमान के बाद भी प्रयोगशाला परीक्षण और इंसानी क्लिनिकल ट्रायल जरूरी रहेंगे। इसलिए एआई दवा खोजने की पूरी प्रक्रिया को खत्म नहीं कर रहा बल्कि उसे तेज और ज्यादा डाटा-आधारित बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

हालांकि, यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि एआई किसी दवा को सीधे तैयार नहीं कर देता है। प्रयोगशाला परीक्षण, क्लिनिकल ट्रायल और सुरक्षा की जांच जरूरी होती हैं। यहां आपको जानना जरूरी है कि एआई को दवा खोजने की प्रक्रिया का विकल्प नहीं बल्कि वैज्ञानिकों की क्षमता बढ़ाने वाले एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।

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AI In Drug Discover - फोटो : Amar Ujala AI Generated

टेक कंपनियां इस क्षेत्र के लिए नई तकनीकें कर रही विकसित

लार्ज लैंग्वेज मॉडल और जनरेटिव एआई जैसी नई तकनीकों ने दवा बनाने की रिसर्च के कई चरणों में नई संभावनाएं पैदा की हैं। एआई बड़ी मात्रा में वैज्ञानिक डाटा का विश्लेषण करके बीमारी से जुड़े संभावित टारगेट पहचानने, नए ड्रग कैंडिडेट खोजने और उनके संभावित असर का अनुमान लगाने में वैज्ञानिकों की मदद कर सकता है। इसका इस्तेमाल सिर्फ दवा खोजने तक सीमित नहीं है। बीमारी के टारगेट की पहचान से लेकर ड्रग डिस्कवरी, प्री-क्लिनिकल रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल और बाजार में दवा आने के बाद उसकी निगरानी तक अलग-अलग चरणों में एआई की भूमिका बढ़ रही है।

दवा की खोज और उसे विकसित करने के काम में एआई का इस्तेमाल आने वाले समय में और तेजी से बढ़ सकता है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियां इस क्षेत्र के लिए नई तकनीकें विकसित कर रही हैं। एनवीडिया के शक्तिशाली जीपीयू और एआई फ्रेमवर्क वैज्ञानिकों को बड़ी मात्रा में डाटा और जटिल कैलकुलेशन को तेजी से प्रोसेस करने में मदद कर रहे हैं। इससे संभावित दवाओं की पहचान और उनकी जांच का काम पहले के मुकाबले ज्यादा तेजी से किया जा सकता है।

वहीं गूगल हेल्थ मशीन लर्निंग और डाटा विश्लेषण का इस्तेमाल करके बीमारी और मरीजों से जुड़े डाटा के आधार पर बेहतर अनुमान लगाने की दिशा में काम कर रहा है। एपल हेल्थ अपने हेल्थ डाटा इकोसिस्टम के जरिए लोगों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को एक जगह उपलब्ध कराने और रियल-टाइम हेल्थ मॉनिटरिंग जैसी संभावनाओं को बढ़ावा दे रहा है।

इसके अलावा दूसरी ओर ओपनएआई के लार्ज लैंग्वेज मॉडल वैज्ञानिकों को बड़ी मात्रा में रिसर्च पेपर और वैज्ञानिक जानकारी समझने, नए सवाल तैयार करने और संभावित शोध विचारों पर काम करने में मदद कर सकते हैं। इन सभी तकनीकों का उद्देश्य दवा विकसित करने की पूरी प्रक्रिया को ज्यादा तेज और व्यवस्थित बनाना है। अगर इनका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, तो भविष्य में दवा खोजने में लगने वाला समय और खर्च कम हो सकता है और मरीजों के लिए ज्यादा सटीक इलाज विकसित करने में मदद मिल सकती है।

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