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'आंखों के सामने ही घर जलते रहे, बुझाने को पानी नहीं था'

Tue, 19 Apr 2016 02:23 PM IST
समीरात्मज मिश्र/बीबीसी
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बुंदेलखंड का सूखा बना बड़ी मुसीबत - फोटो : बीबीसी
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यूं तो पूरा बुंदेलखंड ही सूखे की वजह से पानी की समस्या से जूझ रहा है। लेकिन उसमें भी कुछ जगह यह संकट कुछ ज्यादा ही है। झांसी जिले का बोडा गांव शायद सबसे ज्यादा संकट झेल रहा है।
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मऊरानीपुर तहसील के बंगरा ब्लॉक का ये गांव है। इस ब्लॉक के तमाम गांवों में मुख्य सड़क से गांव में घुसते ही पानी ढोने के तमाम देसी साधन इस्तेमाल करते हुए लोग दिख जाते हैं।

कोई साइकिल पर आठ दस डिब्बे टांगे हुए है तो कुछ महिलाएं सिर पर तीन चार घड़े रखे हुए हैं या फिर कुछ लोग बैलगाड़ी पर भी पानी से भरे बड़े-बड़े ड्रम लादे हुए दिख जाएंगे।
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गांव के लोगों ने बताया कि आसपास के कुछ कुंओं और हैंड पंपों पर पानी मिल जाता है। इससे सबका काम चलता है। लेकिन इस पानी को लाने के लिए दो-दो किमी दूर तक जाना पड़ता है और उसके बाद पानी के लिए लाइन लगानी पड़ती है।

'पहले पानी जरूरी है या पढ़ाई'

बुंदेलखंड का सूखा बना बड़ी मुसीबत - फोटो : बीबीसी
साइकल पर पानी लाने का काम ज्यादातर युवा और बच्चे करते हैं। ऐसे में, बच्चों के बारे में मैंने कुछ लोगों से पूछ लिया कि जब दिन का एक बड़ा हिस्सा पानी लाने में ही बीत जाता है तो ये पढ़ाई कब करते होंगे? मुझे टका सा जवाब मिल गया, "पहले पानी जरूरी है या पढ़ाई।

पानी भरने से फुर्सत मिले तब तो स्कूल जाएं।" हैंडपंप के किनारे अपनी बारी का इंतजार कर रहीं ममता, उमा, सरोज, मोहित, प्रमोद ये सभी स्कूल जाते हैं। इनका कहना है कि एक तो आठवीं से आगे का स्कूल भी गांव में नहीं है, दूसरे, पानी की समस्या ने पढ़ाई से युवाओं की बेरुखी को और बढ़ा दिया है।

बोडा गांव के प्रधान बाबूलाल कुशवाहा बताते हैं, ''सात हजार की आबादी वाले हमारे गांव में पांच तालाब हैं, पांचों सूखे पड़े हैं। लगभग 25 हैंडपंप हैं जिनमें सिर्फ 2 चल रहे हैं दो नए लगवाए हैं, वो भी चल रहे हैं।''

आग बुझाने के लिए भी नहीं था पानी

बुंदेलखंड का सूखा बना बड़ी मुसीबत - फोटो : बीबीसी
पानी के संकट का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जालौन जिले के कदौरा कस्बे में पिछले दिनों आग लग गई लेकिन आग को बुझाने के लिए लोगों के पास पानी नहीं था। कदौरा में रजिया खातून के कच्चे मकान में पिछले दिनों आग लग गई।

लोगों ने घरों में पीने के लिए रखे पानी से आग बुझाने की कोशिश की लेकिन महज कुछ बाल्टी पानी आग बुझाने के लिए पर्याप्त नहीं थी। लोग बेबस होकर आग से जलते घर को देखते रहे। ऐसे ही, हमीरपुर जिले के झलोखर गांव में पिछले दिनों एक मकान में आग लग गई।

गांव में फायर ब्रिगेड आ नहीं सकती थी और गांव के लोगों के पास इतना पानी नहीं था कि उसे बुझा पाते। नतीजतन, घर में जो कुछ भी था जलकर खाक हो गया। यही नहीं, आग में झुलसने से महेश वाल्मीकि की मौत हो गई।

आगजनी की हुई कई घटनाएं

बुंदेलखंड का सूखा बना बड़ी मुसीबत - फोटो : बीबीसी
आग लगने और पानी न होने से बुझा पाने की असमर्थता का ये एक उदाहरण है। अप्रैल की शुरुआत से ही बुंदेलखंड इलाके में आगजनी की ऐसी कई घटनाएं सुनने में आईं।

खेतों में तो आए दिन आग लग जाती है और जो भी फसल किसी तरह से हुई भी है, जलकर खाक हो जाती है। सूखे के संकट से निपटने के लिए राहत पैकेज तो जारी किए गए और लोगों तक पहुंचाने का दावा भी किया गया, लेकिन लगता है कि जल संकट को तवज्जो नहीं दी गई।

स्थानीय पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता आशीष सागर कहते हैं कि पानी संकट के चलते यहां कई कहावतें मशहूर हैं जिनमें 'गगरी न फूटे चाहे खसम मर जाए' सबसे ज्यादा चर्चित है। बावजूद इसके, इसे दूर करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई।

सारा इलाका पानी के लिए कर रहा त्राहि-त्राहि

बुंदेलखंड का सूखा बना बड़ी मुसीबत - फोटो : बीबीसी
वो बताते हैं कि अब जबकि जलस्तर की समस्या आ पड़ी है तब ये इलाका पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है। हालांकि सत्तर के दशक में अपने समय में एशिया की सबसे बड़ी जल परियोजना के नाम से मशहूर पाठा पेयजल परियोजना शुरू हुई थी। इसमें पाइपलाइन के जरिए मानिकपुर तक पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की गई थी।

चित्रकूट के सामाजिक कार्यकर्ता अभिमन्यु बताते हैं कि परियोजना के पूरा होने पर चित्रकूट के अलावा मानिकपुर के दूरदराज इलाके में बसे आदिवासियों के लिए भी पीने का पानी मिलने लगा, लेकिन बाद में बदइंतजामी के चलते इसका जितना लाभ मिलना चाहिए था, वो नहीं मिल सका।

झांसी के जिलाधिकारी अजय शुक्ल कहना है कि प्रशासन समस्याओं से वाकिफ है और उसे दूर करने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने दावे के साथ कहा कि इन गांवों में टैंकरों की सप्लाई सुनिश्चित कर दी गई है। मैंने उन्हें अपना अनुभव बताया कि दो दिन के दौरे में मुझे एक भी टैंकर नहीं दिखा, गांव की तो बात ही छोड़िए।

इस पर डीएम साहब मातहतों पर खासे नाराज हुए, तुरंत टैंकर भेजने का आदेश दिया, लेकिन पांच दिन बाद जब बोडा गांव में फोन पर कुछेक लोगों से मेरी बात हुई तो पता चला कि टैंकर अब तक नहीं पहुंचा है।
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लोगों में हो रहा जमकर संघर्ष

बुंदेलखंड का सूखा बना बड़ी मुसीबत - फोटो : बीबीसी
मऊरानीपुर के ही रहने वाले भारतीय किसान यूनियन के नेता शिवनारायण सिंह परिहार बताते हैं, ''खेत में हुई बोरिंग से पानी भरकर लोगों तक पहुंचाने के लिए पाइप से उसे बांटा जा रहा है। लोग लंबी लाइनों में लगकर पानी ले रहे हैं। इसे लेकर लोगों में जमकर संघर्ष भी हो रहा है।''

वहीं महोबा जिले के कपसा गांव के लोग पानी की दोहरी मार सह रहे हैं। पानी का जो संकट पूरे बुंदेलखंड में है, वह तो है ही, हैंडपंपों से निकलने वाला पानी इतना खारा है कि मुश्किल से ही कोई पी सकता है।

गांव वालों का कहना है कि मजबूरी में यही पानी पीना भी पड़ता है। नहाने के लिए तो लोगों के पास दो ही साधन हैं- या तो कोई बेतवा, यमुना, केन जैसी कोई नदी हो जिसमें पानी हो या फिर कोई तालाब हो जिसमें थोड़ा बहुत पानी बचा हो। छोटी नदियां तो इस कदर सूखी हुई हैं जैसे उनमें कभी पानी रहा ही न हो। पानी के अभाव में यहां के लोग पशुपालन भी नहीं कर पा रहे हैं।
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