जांच एजेंसी ईडी के सूत्रों का कहना है कि अजित पवार, शरद पवार और उनके कई सहयोगियों के खिलाफ धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत दर्ज हुए मामलों की जांच चल रही है। इन लोगों को पूछताछ के लिए जल्द ही समन भेजा जा सकता है।
बता दें कि महाराष्ट्र के सियासी दंगल में जब अजित पवार तीन दिन वाली भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए थे, तब ऐसी खबरें आई थीं कि उनके खिलाफ कई मामले वापस लिए जा रहे हैं। यहां पर केवल उन मामलों का जिक्र था, जो भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने 2013 में दर्ज किए थे। इनमें 70,000 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले का आरोप है। हालांकि बाद में एसीबी की ओर यह स्पष्टीकरण भी आया कि सिंचाई घोटाले से जुड़े नौ मामले जो सोमवार को बंद किए गए हैं, उनका अजित पवार से कोई संबंध नहीं है।
इनमें से कुछ मामले विदर्भ सिंचाई विकास निगम से जुड़े हैं। जिस वक्त ये मामले सामने आए थे, तब अजित पवार ही निगम के अध्यक्ष थे। हाालंकि चुनाव प्रचार के दौरान खुद देवेंद्र फडणवीस अपनी जनसभाओं में यह कहते थे कि भाजपा सत्ता में आई तो पूर्व सिंचाई मंत्री अजित पवार जेल में चक्की पीसेंगे।
महाराष्ट्र में 1999 से 2009 के बीच कथित तौर पर 70 हजार करोड़ रुपये का सिंचाई घोटाला हुआ था। मामले की प्रारंभिक जांच में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने नवंबर 2018 में अजित पवार को घोटाले के लिए जिम्मेदार ठहराया था। महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मुंबई उच्च न्यायालय के समक्ष भी यह बात बताई थी। अदालत के समक्ष कहा गया था कि करोड़ों रुपये के कथित सिंचाई घोटाले की जांच में अजित पवार तथा कई सरकारी अधिकारियों की बडी चूक सामने आई है। यह घोटाला करीब 70,000 करोड़ रुपए का है, जो कांग्रेस-एनसीपी के शासन के दौरान अनेक सिंचाई परियोजनाओं को मंजूरी देने और उन्हें शुरू करने में कथित भ्रष्टाचार तथा अनियमितताएं बरतने से जुड़ा है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के एक अधिकारी का कहना है कि अजित पवार, शरद पवार और उनके कई सहयोगियों के खिलाफ धन शोधन के जो मामले दर्ज हैं, उसमें अब कभी भी पूछताछ के समन भेजा जा सकता है। ईडी ने सितंबर में शरद पवार और उनके भतीजे एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के खिलाफ 25,000 करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप में धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) का मामला दर्ज किया था। यह मामला महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक से संबंधित है।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री एवं एनसीपी प्रमुख शरद पवार को ईडी ने पुलिस एफआईआर के आधार पर नामित किया है। यह मामला महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले दर्ज किया गया था। सूत्र बताते हैं कि इस मामले में आरोपियों को पूछताछ के लिए बुलाया जाना था। इस बाबत कई बार नोटिस तैयार किया गया, लेकिन अंतिम क्षणों में उसे रोक लिया जाता।
इसकी वजह कुछ कानूनी पहलू बताई गई, लेकिन सूत्रों की मानें तो ये सब कथित तौर से केंद्र के इशारे पर हो रहा था। ईडी ने जो मामला दर्ज किया था, उसके अन्य आरोपियों में दिलीप राव देशमुख, इशरलाल जैन, जयंत पाटिल, शिवाजी राव, आनंद राव अडसुल, राजेंद्र शिंगाने और मदन पाटिल शामिल हैं।
मुंबई पुलिस ने हाईकोर्ट के निर्देश पर एमएससीबी घोटाला मामले में अजित पवार और अन्य पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। 2007 और 2011 के बीच कथित रूप से एमएससीबी को 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान पहुंचाने की बात भी सामने आई थी। अजित पवार और दूसरे आरोपियों के बारे में यह कहा गया है कि उन्होंने सहकारी चीनी कारखानों के लिए ऋण संवितरण में अनियमितताएं बरती थीं।
नियमों के खिलाफ जाकर ऋण स्वीकृत किए गए थे। कई मामलों में तो ऋण देने के लिए बतौर जमानत कुछ नहीं लिया गया। बाद में सहकारी चीनी कारखानों को कथित तौर पर कुछ नेताओं के करीबी रिश्तेदारों को बेच दिया गया था।
जांच एजेंसियों के मुताबिक, अजीत पवार के खिलाफ मामला आगे ले जाने के लिए पर्याप्त सबूत थे। वजह वे बैंक के खुद निदेशक रहे हैं। जांच एजेंसी उन्हें कभी भी हिरासत में ले सकती थीं। नाबार्ड की ऑडिट रिपोर्ट में भी चीनी कारखानों और कताई मिलों के ऋण वितरण में आरोपियों ने कई बैंकिंग कानूनों व आरबीआई के दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया था। स्थानीय कार्यकर्ता सुरिंदर अरोड़ा ने 2015 में ईओडब्ल्यू के साथ मिलकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उसके बाद ही आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा सकी थी।
ईडी ने जब मामला दर्ज किया तो फौरी तौर से शरद पवार ने इस पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि मामला राज्य सरकार ने दायर किया है या ईडी ने। हालांकि बाद में उन्होंने कहा कि वे खुद ईडी के दफ्तर जाकर इस मामले की जानकारी देंगे। अब अजित पवार दोबारा से अपनी पार्टी में चले गए हैं, इसलिए यह सम्भावना प्रबल हो गई है कि ईडी उनके खिलाफ अपनी जांच तेज कर दे।