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सुप्रीम कोर्ट के वो 11 ऐतिहासिक फैसले जिनका हमपर पड़ा असर

Fri, 21 Dec 2018 03:40 PM IST
अनिल पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट
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साल 2018 को खत्म होने में अब कुछ ही समय बचा हुआ है। नया साल बांहे फैलाकर हम सभी का स्वागत करने के लिए तैयार है लेकिन एक बार इस साल हुई कुछ अच्छी बातों के बारे में जान लेना चाहिए। इस साल उच्चतम न्यायालय ने कई मामलों में ऐतिहासिक फैसले दिए। जिसमें इच्छामृत्यु से लेकर सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति तक देना शामिल है।

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अक्तूबर में भारत के मुख्य न्यायधीश (सीजेआई) पद से सेवानिवृत्त हुए न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने सबसे ज्यादा ऐतिहासिक फैसले दिए। इन आदेशों का कुछ लोगों ने स्वागत किया तो कुछ ने इसका विरोध किया। आइए जानते हैं उच्चतम न्यायालय के 11 अहम फैसले जिन्होंने कई जिंदगियों को प्रभावित किया।

  1. धारा 377 को वैध बनाना: उच्चतम न्यायालय ने 6 सितंबर, 2018 को धारा 377 को वैध कर दिया। पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की संविधान पीठ ने दो वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से स्थापित समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। इस फैसले ने एलजीबीटी समुदाय का भारत की न्यायिक व्यवस्था में विश्वास पैदा करने का काम किया। इस फैसले ने उन लोगों को राहत देने का काम किया जिन्हें कि समाज में अपराधियों की तरह देखा जाता था। 
  2. सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देना: उच्चतम न्यायालय ने 26 सितंबर को अपने पूर्व के फैसले के खिलाफ दायर की गई पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को सरकारी नौकरी में पदोन्नति के समय आरक्षण देने की मांग पर विचार करने के लिए कहा गया था। जिसे कि अदालत ने खारिज कर दिया। 
  3. आधार की अनिवार्यता: उच्चतम न्यायालय ने 26 सितंबर, 2018 को आधार की वैधता को बरकरार रखा था लेकिन साथ ही कुछ सीमाएं तय करते हुए आधार अधिनियम की धारा 57 को रद्द कर दिया था। जिसमें अदालत ने कहा था कि निजी कंपनियां आधार नहीं मांग सकते हैं। इसके अलावा बैंक खाता खुलवाने, मोबाइल कनेक्शन लेने के लिए आधार को अनिवार्यता को खत्म कर दिया था। अदालत ने फैसले में कहा था कि सीबीएसई, यूजीसी, निफ्ट और कॉलेज आधार नंबर की मांग नहीं कर सकते हैं। स्कूल में दाखिले के लिए भी आधार नहीं मांगा जा सकता। किसी बच्चे को आधार के बिना सरकारी योजनाओं का लाभ देने से मना नहीं किया जा सकता।
  4. दहेज प्रताड़ना मामला: दहेज प्रताड़ना के मामलों में पति और उसके परिवार की तुरंत गिरफ्तारी को लेकर भी पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा ने एक बड़ा फैसला सुनाया था। फैसले के अनुसार, इन मामलों में आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी पर से रोक हटा लिया गया है। अब अगर कोई महिला अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराती है तो उनकी तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है।  
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सांकेतिक तस्वीर
5. दागी नेता: आपराधिक छवि के नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दायर याचिका पर उच्चतम न्यायालय में पूर्व सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया था। अदालत ने पांच साल या उससे ज्यादा सजा के मामले में आरोप तय होने के बाद उम्मीदवार के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और कानून बनाने का काम संसद के ऊपर छोड़ दिया था। 

6. जनप्रतिनिधि वकील कर सकते हैं प्रैक्टिस: पूर्व न्यायधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें पेशे से वकील जनप्रतिनिधियों के देशभर की अदालतों में प्रैक्टिस करने पर रोक लगाने की मांग की गई थी। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि कानून अदालतों में उनके प्रैक्टिस करने पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता है।

7. अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण: संसद की तरह अब जल्द ही उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय सहित सभी अदालतों की सुनवाई का सीधा प्रसारण किया जाएगा। पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण को हरी झंडी दे दी है। अदालत ने कहा कि अब लोगों को अदालत आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। भारत में अदालत सबके लिए खुली हैं।

8. राम जन्मभूमि: बाबरी मस्जिद- पूर्व सीजेआई की अध्यक्षता वाली विशेष खंडपीठ ने अयोध्या में श्रीराम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सिर्फ मालिकाना हक के वाद के रूप में ही विचार करने और तमाम हस्तक्षेपकर्ताओं को दरकिनार करने का निश्चय करके यह सुनिश्चित किया कि इस संवेदनशील मामले में जल्द से जल्द सुनवाई शुरू हो सके।

9. व्यभिचार: ऐतिहासिक फैसला देते हुए उच्चतम न्यायालय ने व्यभिचार को भारत में आपराधिक श्रेणी से बाहर कर दिया था। अपने फैसले में अदालत ने परस्त्रीगमन को अपराध की श्रेणी में रखने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित करते हुये उसे निरस्त कर दिया था। अदालत ने धारा 497 की व्याख्या करते हुए कहा था कि इस धारा के अनुसार पत्नी पति की संपत्ति मानी जाती है जोकि भेदभावपूर्ण है।

10. राफेल: राफेल देशभर में एक ऐसा मुद्दा बना हुआ है जिसकी वजह से कांग्रेस ने तीन राज्यों में भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया। इस मामले को लेकर अदालत में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। जिसपर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को क्लीनचिट दे दी थी। फैसले में अदालत ने कहा था, 'राफेल सौदे में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर संदेह करने का कोई अवसर नहीं है। हमें लड़ाकू विमानों की जरूरत है और देश लड़ाकू विमानों के बगैर नहीं रह सकता है। राफेल लड़ाकू विमानों की कीमत पर निर्णय लेना अदालत का काम नहीं है।'

11. इच्छामृत्यु: उच्चतम न्यायालय के पांच जजों की संविधान पीठ ने लिविंग विल यानी इच्छा मृत्यु को मंजूरी दे दी थी। अदालत ने लिविंग विल में पैसिव यूथेनेशिया को इजाजत देते हुए सुरक्षा उपायों के लिए गाइडलाइन भी जारी की थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा था कि जीने के अधिकार में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल है ये हम ये नहीं कहेंगे। हम ये कहेंगे कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीड़ारहित होनी चाहिए। कुछ ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जिसमें गरिमपूर्ण तरीके से मृत्यू हो सके।
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