यूरोप में नदियों को उनके मूल प्राकृतिक रूप में लौटाने की ऐतिहासिक मुहिम तेज हो चुकी है। 2024 में रिकॉर्ड 542 अवरोध हटाए गए और लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक 25,000 किलोमीटर नदियां बिना किसी बाधा के बह सकें। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की चेतावनी के अनुसार यदि यह रफ्तार वैश्विक स्तर पर नहीं बढ़ी तो अगले पांच वर्षों में भारत समेत दुनिया की 90% नदियां गंभीर रूप से बाधित हो सकती हैं। भारत के लिए यह चेतावनी न केवल पर्यावरणीय बल्कि सामाजिक व रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।
यूरोप में नदियों को उनके मूल प्राकृतिक रूप में लौटाने के लिए ‘डैम रिमूवल यूरोप’ नामक एक गठबंधन के नेतृत्व में एक बड़ा अभियान चलाया जा रहा है। यह गठबंधन डब्ल्यूडब्ल्यूएफ, द रिवर्स ट्रस्ट, द नेचर कंजरवेंसी और यूरोपियन रिवर्स नेटवर्क समेत छह संगठनों का साझा मंच है। इस मुहिम के तहत 2024 में यूरोप के 23 देशों ने कुल 542 अवरोध हटाए। इनमें बांध, वीयर, कलवर्ट और स्लूइस जैसी संरचनाएं शामिल थीं। यूएनईपी की रिपोर्ट ‘फ्रंटियर्स 2025 : द वेट ऑफ टाइम’ में स्पष्ट कहा गया है कि अगर मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही तो वर्ष 2030 तक दुनिया की 90% नदियां मध्यम से लेकर गंभीर स्तर तक अवरुद्ध हो जाएंगी। रिपोर्ट में कहा, जहां एक ओर बांधों से सिंचाई, जलविद्युत और बाढ़ नियंत्रण जैसे लाभ मिले, वहीं इनसे अधिक नुकसान आदिवासी और मछुआरा समुदायों को हुआ है। अवरोधों के कारण मछलियों की आवाजाही, तलछट प्रवाह, जल प्रवाह और तापमान सब प्रभावित होते हैं।
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परियोजनाओं का दीर्घकालिक पारिस्थितिक मूल्यांकन जरूरी
अमेरिका समेत उत्तर अमेरिका में भी अब पुराने और निष्क्रिय बांधों को हटाया जा रहा है, ताकि यह समझा जा सके कि किस तरह नदी तंत्र समय के साथ स्वयं को पुनर्जीवित करता है। वहीं अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका में अभी भी बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजनाएं बनाई जा रही हैं जिन्हें हरित ऊर्जा का विकल्प बताया जा रहा है। परंतु यूएनईपी की रिपोर्ट चेताती है कि बिना दीर्घकालिक पारिस्थितिक मूल्यांकन के ये परियोजनाएं स्थानीय जैवविविधता के लिए विनाशकारी साबित हो सकती हैं।
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भारत में भी नदी स्वास्थ्य नीति की जरूरत
भारत सरकार को यूरोप की तर्ज पर नदी स्वास्थ्य नीति बनाने की जरूरत है, जिसमें पुराने और अनुपयोगी बांधों की समीक्षा, पारिस्थितिकीय पुनर्स्थापना की रणनीति और नदी से जुड़े समुदायों के हितों की रक्षा शामिल हो। भारत में कई पुराने और बड़े बांध दशकों पहले निर्मित हुए थे। इनमें हीराकुंड बांध, भाखड़ा नांगल, सरदार सरोवर प्रमुख हैं। इन बांधों ने सिंचाई, जलविद्युत और बाढ़ नियंत्रण में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन समय के साथ इनकी उपयोगिता, सुरक्षा और सामाजिक लागत पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। कई बांध अब उम्रदराज हो चुके हैं और संरचनात्मक रूप से कमजोर हैं।
- सेंट्रल वाटर कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 209 बांध 100 साल से ज्यादा पुराने हो चुके हैं, जबकि 1,000 से ज्यादा बांध 50 साल की उम्र पार कर चुके हैं। यह चिंता का विषय है, खासकर भूकंप या जलवायु परिवर्तन के दौर में इनकी विफलता से भारी तबाही हो सकती है। इन पुराने बांधों से जुड़े विवादों में सबसे चर्चित नर्मदा बचाओ आंदोलन रहा है, जो सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित लाखों विस्थापित लोगों के अधिकारों और पुनर्वास को लेकर शुरू हुआ था।