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हिंदी हैं हम: दूसरे वेबिनार में अलग-अलग हिस्सों से लोगों ने रखी बात, मन की बात मातृभाषा में ही संभव

Tue, 01 Sep 2020 06:45 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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#हिंदीहैंहम का दूसरा अंतरराष्ट्रीय वेबिनार - फोटो : Amar Ujala
अपनी जमीन से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भारतीय परंपराओं के पोषकों ने माना कि हिंदी विश्व की सबसे श्रेष्ठ, सरल और मधुर भाषा है। परदेस में भी हमारी मातृभाषा और भारतीय संस्कृति को मानने वालों की तादात बढ़ी है। लेकिन फिर भी हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से चलाये जा रहे #हिंदीहैंहम अभियान के अगले चरण में शनिवार को दूसरे अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इस दौरान ‘मातृभाषा हिंदी की चुनौतियाँ, अवसर और आपके अनुभव’ नामक विषयक वेबिनार में दुनिया के अलग-अलग देशों से लोगों ने हिस्सा लिया।
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मनीष दीक्षित, व्यवसायी, न्यूजीलैंड (होटल, रेस्त्रां और निर्माण आदि का व्यापार)

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मनीष दीक्षित - फोटो : Amar Ujala
हिंदी भाषा को लेकर लोगों में हीनभावना देखने को मिलती है। आज कल युवा हिंदी बोलने में शर्माते हैं। समय के साथ हमें अपनी भाषा के सरलीकरण पर ध्यान देना होगा, जिससे युवा सहजता और आत्मीयता से इसे अपना सके। युवाओं में हिंदी के प्रति रुझान पैदा करने के लिए हमें उनकी पसंदीदा चीजों और विषयों को सरल हिंदी में करके उन तक पहुँचाना होगा। हमें अपनी भाषा और देश पर गर्व होना चाहिए।
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मयंक छाया, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, कैलीफोर्निया (संपादक, भारत एफ.एम.)

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मयंक - फोटो : Amar Ujala
युवा पीढ़ी का रुझान हिंदी भाषा की तरफ दिनों दिन कम होता दिख रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि युवाओं ने पढ़ना बंद कर दिया है, ये दुर्भाग्य की बात है। दूसरे देशों में लोग अपनी मातृभाषा को लेकर खासा सम्मानित महसूस करते हैं। यह भाव भारतीय युवाओं में भी जागृत होनी चाहिए।

गौरव चौधरी, विद्यार्थी, ऑस्ट्रेलिया (अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक, डैनफोर्ड कॉलेज मेलबॉर्न)

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गौरव - फोटो : Amar Ujala
अपने भावनाओं की अभिव्यक्ति और मन की बात हम अपनी मातृभाषा में ही कर सकते है। अंग्रेजी को अधिक महत्त्व देने की वजह से हिंदी भाषा के प्रति युवाओं का रुझान कम हो रहा है। बच्चे अपने घर के माहौल में ज्यादा सीखते हैं। अपनी जड़ से जुड़े होने का अनुभव हमें गौरवान्वित महसूस कराता है।
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नीरज भाटिया, चार्टर्ड एकाउंटेंट, कैलीफोर्निया (अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कर नियोजन के जानकार)

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नीरज - फोटो : Amar Ujala
नीरज भाटिया जनवरी, 2018 एन.आर.आई. वेलफेयर सोसाइटी, थाईलैंड की ओर से ‘हिन्द रत्न सम्मान’ से सम्मानित हैं। इनका कहना है कि औपचारिक तौर पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर प्रयास करना है। अपनी नींव को मजबूत बनाने के लिए हमें प्राथमिक शिक्षा में हिंदी की अनिवार्यता होने पर जोर देना होगा।
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डॉ. संहिता अग्निहोत्री, समाज सेविका, शिकागो (वर्ष 2018 में उत्तर-प्रदेश सरकार की तरफ से सर्वश्रेष्ठ एन.आर.आई. पुरस्कार से सम्मानित), लेखिका- परदेसी मन

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संहिता - फोटो : Amar Ujala
मुझे हिंदी भाषा विरासत में मिली है, तो मैं इस बात को बेहतर समझतीं हूँ कि यदि अभिभावक ध्यान दें तो हम हिंदी को एक नए मुकाम पर पहुंचा सकते हैं। युवाओं को अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करना होगा। शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी। उसके बाद ही बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। इसमें माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। भाषा के लिहाज से हर भाषा का सम्मान है, लेकिन मातृभाषा का स्थान कोई और भाषा नहीं ले सकती।
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संजय अस्थाना, आई.बी.एम. सह-निदेशक, सिंगापुर (मूलतः बिहार से)

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संजय अस्थाना - फोटो : Amar Ujala
सतही तौर पर यह हमारी राष्ट्रीयता और विविधता में एकता का विषय है। हिंदी बहुत ही प्रामाणिक भाषा है। अपने देश में संभावनाओं और प्रतिभाओं की कमी नहीं है। बच्चों से अधिक उनके अभिभावक इसके लिए जिम्मेदार हैं, जो हिंदी महिमा मंडित होने के कारण अपनी जमीनी हकीकत को छोड़कर अंग्रेजी भाषा की ओर रुख कर रहें हैं।

अन्वेश मुखर्जी, प्रबंधक, एक्सिस कम्युनिकेशन, लेखक, स्वीडन (मूलतः कोलकाता से)

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अन्वेष - फोटो : Amar Ujala
भाषा संवाद के साथ हमारी सभ्यता का भी प्रतिक है। मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए हमें अंग्रेजी भाषा के साथ अपनी मातृभाषा को भी लेकर चलना होगा। दिनों दिन बढ़ते एकाकी परिवार में दादी-नानी के नुस्खे और किस्से-कहानियों का अस्तित्व संकट में दिख रहा है। हमें इस दिशा में भी ध्यान देने की जरुरत है।

रूबी गुप्ता, गृहिणी, ह्यूस्टन  

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रूबी गुप्ता - फोटो : Amar Ujala
हिंदी हमारी पहचान है। आगे बढ़ने की होड़ में हम पीछे अपनी मूल भाषा, संस्कृति और परंपराओं को छोड़ते जा रहे हैं। हिंदी को बढ़ावा देना हम सभी का उत्तरदायित्व है। इसमें समाचार पत्र और पत्रिकाओं की अहम भूमिका है। दूसरी भाषाओँ में अनुवाद तो हो जाता है, लेकिन भावनाएं खत्म हो जाती हैं। विकास का मतलब चंहुमुखी होना चाहिए। बीते समय में हिंदी को वह सम्मान नहीं मिल पाया, जो उसे मिलना चाहिए था।
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डॉ. रवि चितवन, एयरो स्पेस साइंटिस्ट, इंग्लैंड (रक्षा संबंधी उपकरणों के निर्माण और अनुसंधान विशेषज्ञ)

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रवि - फोटो : Amar Ujala
माता-पिता अंग्रेजी शिक्षा की ओर अधिक ध्यान दे रहें हैं इसलिए युवा वर्ग हिंदी को उपेक्षित नजरों से देखता है। हमें हिंदी को बढ़ावा देने के लिए बच्चों को माकूल माहौल देना होगा। तकनीकी युग में हिंदी भाषा नवाचार व रोजगार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। तकनीकी सहायक हो सकती है, पूरक नहीं। इसलिए हमारा अपनी जमीन से जुड़े रहना बेहद जरुरी है।
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