अदाणी समूह की तरफ से शेयर मूल्य में हेरफेर के आरोपों से संबंधित दो लंबित मामलों में अपनी जांच को जल्द पूरा करने के लिए सेबी को निर्देश देने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है। इस मामले में याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि सेबी की चेयरपर्सन माधबी बुच के खिलाफ अमेरिकी शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च की नई रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कथित अदाणी मनी साइफनिंग घोटाले में इस्तेमाल किए गए अस्पष्ट ऑफशोर फंड में उनकी और उनके पति की हिस्सेदारी थी, जिससे आम जनता और निवेशकों के मन में संदेह का माहौल पैदा हो गया है।
विशाल तिवारी 2023 में शीर्ष अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं में से एक थे और उन्होंने अदाणी समूह की तरफ से शेयर मूल्य में हेरफेर के आरोपों की जांच की मांग की थी। 3 जनवरी को, समूह के लिए एक महत्वपूर्ण जीत में, शीर्ष अदालत ने स्टॉक मूल्य में हेरफेर के आरोपों की जांच को एक विशेष जांच दल या केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि बाजार नियामक एक व्यापक जांच कर रहा था और उसका आचरण विश्वास को प्रेरित करता है।
नई अर्जी में याचिकाकर्ता की दलील
वहीं अपनी नई अर्जी में विशाल तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के 5 अगस्त के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें अदाणी समूह के खिलाफ लगाए गए आरोपों से संबंधित दो मामलों में सेबी की तरफ से लंबित जांच को शीघ्र पूरा करने के लिए उनकी याचिका को पंजीकृत करने से इनकार कर दिया गया था। हिंडनबर्ग की ताजा रिपोर्ट का हवाला देते हुए विशाल तिवारी ने कहा, "सेबी प्रमुख ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए इनकार किया है और इस अदालत ने यह भी माना है कि तीसरे पक्ष की रिपोर्ट पर विचार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस सबने जनता और निवेशकों के मन में संदेह का माहौल पैदा कर दिया है और ऐसी परिस्थितियों में सेबी के लिए लंबित जांच को समाप्त करना और जांच के निष्कर्ष की घोषणा करना अनिवार्य हो जाता है।
बुच दंपति ने किया आरोपों का खंडन
उन्होंने कहा, रिपोर्ट में व्हिसलब्लोअर के दस्तावेजों का हवाला दिया गया है। यह रिपोर्ट अदाणी समूह पर अपनी नुकसानदायक रिपोर्ट के डेढ़ साल बाद आई है, जिसके दूरगामी परिणाम हुए थे, जिसमें कंपनी के प्रमुख 20 हजार करोड़ रुपये के फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर को रद्द करना भी शामिल है। इधर हिंडनबर्ग रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद, माधबी बुच और उनके पति धवल बुच ने एक संयुक्त बयान में रिपोर्ट में लगाए गए निराधार आरोपों और आक्षेपों का दृढ़ता से खंडन किया।
वहीं अपनी अर्जी में विशाल तिवारी ने शीर्ष अदालत से कहा कि यह जनहित में है और 2023 में हिंडनबर्ग रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद अपना पैसा गंवाने वाले निवेशकों के हित में है कि वे सेबी की तरफ से की गई जांच और उसके निष्कर्षों के बारे में जानें। याचिकाकर्ता विशाल तिवारी ने दलील दी कि पंजीकरण के लिए कोई उचित कारण नहीं के आधार पर उनकी याचिका को पंजीकृत करने से इनकार करके रजिस्ट्रार ने वस्तुतः उनके मौलिक अधिकार को निलंबित कर दिया है और याचिकाकर्ता के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा हमेशा के लिए बंद कर दिया है।
'लंबित जांच पूरी करने के लिए एक निश्चित समय अवधि निर्धारित'
याचिकाकर्ता के आवेदन में कहा गया है, न्यायालय ने सेबी की तरफ से जांच पूरी करने के लिए स्पष्ट रूप से तीन महीने की समयसीमा तय की है। अधिमानतः शब्द का उपयोग करके यह नहीं समझा जा सकता है कि कोई समयसीमा तय नहीं की गई थी। जब आदेश में विशेष रूप से तीन महीने का उल्लेख किया गया है, तो यह विवेकपूर्ण समझा जाना पर्याप्त है कि लंबित जांच पूरी करने के लिए एक निश्चित समय अवधि निर्धारित की गई है। वहीं हिंडनबर्ग रिसर्च की 10 अगस्त की रिपोर्ट का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ता ने कहा कि इसमें आरोप लगाया गया है कि भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की वर्तमान अध्यक्ष और उनके पति के पास अडानी समूह के कथित धन गबन घोटाले से जुड़े ऑफशोर फंड में हिस्सेदारी थी।