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15 साल में दोगुनी गति से पिघले हैं हिमालय के ग्लेशियर्स

न्यूज डेस्क, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Sat, 06 Jul 2019 06:28 PM IST
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प्रतीकात्मक ग्राफिक्स - फोटो : सोशल मीडिया

हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो कि काफी चिंताजनक है। ग्लेशियरों की स्थिति पर हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले करीब दो दशकों से इनके पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। तापमान लगातार बढ़ने के कारण हिमालय के साढ़े छह सौ ग्लेशियर संकट में हैं। इस बारे में राज्यसभा में भी चिंता जताई गई है। कांग्रेस नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने राज्यसभा में बताया कि सियाचिन और गंगोत्री सहित हिमालय क्षेत्र के करीब 10 हजार ग्लेशियर तेजी से और लगातार पिघल रहे हैं।

उपग्रह से किए गए सर्वेक्षण और एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते 15 वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हुई है। यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियों के जल स्तर में वृद्धि हुई है और यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि आने वाले समय में इस वजह से जलसंकट भी बढ़ेगा।



हिमालय के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वॉर्मिंग के असर का आकलन करने वाली एक टीम ने पाया है कि साल 2000 से 2016 के बीच हर साल ग्लेशियरों की औसतन 800 करोड़ टन बर्फ पिघल रही है। इससे पहले के 25 वर्षों यानी 1975 से 2000 तक हर साल औसतन 400 करोड़ टन बर्फ पिघलती रही, लेकिन इसके बाद के डेढ़ दशक में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है। अब सवाल ये खड़ा होता है कि ऐसे हालात में ग्लेशियरों की पूरी हिमालयन रेंज कब तक पिघल जाएगी? और आने वाले समय में खतरनाक नतीजे क्या होंगे?

सात तरीकों से हो सकता है पृथ्वी का नुकसान

पृथ्वी की तस्वीरें खींचने के लिए अमेरिका ने 70 और 80 के दशक में जासूसी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे थे। उनसे मिले चित्रों को थ्रीडी मॉड्यूल में बदलकर किए गए शोध के मुताबिक 1975 से 25 वर्षों तक हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर, हर साल 10 इंच तक घट रहे थे। वह 2000 से 2016 के बीच हर साल औसतन 20 इंच तक घट रहे हैं। साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के मुताबिक करीब 800 करोड़ टन पानी का नुकसान हर साल हो रहा है।

बढ़ा है हिमालय का तापमान

कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने पाया है कि दो हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी पट्टी में फैले हिमालय क्षेत्र का तापमान एक डिग्री से ज्यादा तक बढ़ चुका है। इसकी वजह से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। शोधकर्ताओं ने 40 वर्षों के इन उपग्रही चित्रों का अध्ययन नासा और जापानी अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा के ताजा डेटा के विश्लेषण के साथ किया तो पाया कि कैसे हिमालय क्षेत्र बदल रहा है और कैसे 650 ग्लेशियरों पर खतरा बढ़ रहा है।

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प्रतीकात्मक ग्राफिक्स - फोटो : सोशल मीडिया
हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो कि काफी चिंताजनक है। ग्लेशियरों की स्थिति पर हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले करीब दो दशकों से इनके पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। तापमान लगातार बढ़ने के कारण हिमालय के साढ़े छह सौ ग्लेशियर संकट में हैं। इस बारे में राज्यसभा में भी चिंता जताई गई है। कांग्रेस नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने राज्यसभा में बताया कि सियाचिन और गंगोत्री सहित हिमालय क्षेत्र के करीब 10 हजार ग्लेशियर तेजी से और लगातार पिघल रहे हैं।

उपग्रह से किए गए सर्वेक्षण और एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते 15 वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हुई है। यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियों के जल स्तर में वृद्धि हुई है और यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि आने वाले समय में इस वजह से जलसंकट भी बढ़ेगा।

हिमालय के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वॉर्मिंग के असर का आकलन करने वाली एक टीम ने पाया है कि साल 2000 से 2016 के बीच हर साल ग्लेशियरों की औसतन 800 करोड़ टन बर्फ पिघल रही है। इससे पहले के 25 वर्षों यानी 1975 से 2000 तक हर साल औसतन 400 करोड़ टन बर्फ पिघलती रही, लेकिन इसके बाद के डेढ़ दशक में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है। अब सवाल ये खड़ा होता है कि ऐसे हालात में ग्लेशियरों की पूरी हिमालयन रेंज कब तक पिघल जाएगी? और आने वाले समय में खतरनाक नतीजे क्या होंगे?

सात तरीकों से हो सकता है पृथ्वी का नुकसान

पृथ्वी की तस्वीरें खींचने के लिए अमेरिका ने 70 और 80 के दशक में जासूसी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे थे। उनसे मिले चित्रों को थ्रीडी मॉड्यूल में बदलकर किए गए शोध के मुताबिक 1975 से 25 वर्षों तक हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर, हर साल 10 इंच तक घट रहे थे। वह 2000 से 2016 के बीच हर साल औसतन 20 इंच तक घट रहे हैं। साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के मुताबिक करीब 800 करोड़ टन पानी का नुकसान हर साल हो रहा है।

बढ़ा है हिमालय का तापमान

कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने पाया है कि दो हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी पट्टी में फैले हिमालय क्षेत्र का तापमान एक डिग्री से ज्यादा तक बढ़ चुका है। इसकी वजह से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। शोधकर्ताओं ने 40 वर्षों के इन उपग्रही चित्रों का अध्ययन नासा और जापानी अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा के ताजा डेटा के विश्लेषण के साथ किया तो पाया कि कैसे हिमालय क्षेत्र बदल रहा है और कैसे 650 ग्लेशियरों पर खतरा बढ़ रहा है।

80 साल में पिघल जाएंगे दो तिहाई ग्लेशियर

अगर ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे के मद्देनजर चलाए जा रहे ग्लोबल क्लाइमेट प्रयास नाकाम हुए तो साल 2100 तक हिमालय क्षेत्र के दो तिहाई ग्लेशियर पिघल चुके होंगे। इस खतरे की भयावहता को ऐसे भी समझ सकते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटने के लिए जो महत्वाकांक्षी पेरिस समझौता हुआ, उसका लक्ष्य है कि इस सदी के आखिर तक ग्लोबल वॉर्मिंग को डेढ़ डिग्री तक सीमित किया जाए, लेकिन ऐसा कर पाने के बावजूद तब तक 2.1 तक डिग्री तापमान बढ़ चुका होगा।

इसका नतीजा ये होगा कि दो तिहाई तक हिमालयन ग्लेशियर पिघल चुके होंगे और एशिया के जिन इलाकों में इन ग्लेशियरों के कारण नदियां प्रवाहित होती हैं, उन पर निर्भर करने वाली करीब दो अरब लोगों की आबादी सीधे तौर पर जीवन संकट से जूझेगी।

ग्लोबल वॉर्मिंग = ग्लेशियर्स को पिघलना = हिमालयन में सुनामी

दुनिया के पर्यावरणविद् इस खतरे को भांप चुके हैं और वो इसे इस सूत्र के रूप में देखते हैं। इन सभी का मानना है कि यदि ग्लेशियर इसी रफ्तार से पिघलते रहे हो हिंदुकुश क्षेत्र के आठ देशों में हिमालयन सुनामी आ जाएगी। ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी होने के बाद आठ देशों के लिए खतरे की घंटी बजी हैः
  1. भारत
  2. चीन
  3. म्यांमार
  4. नेपाल
  5. अफगानिस्तान
  6. पाकिस्तान
  7. बांग्लादेश
  8. भूटान
ये आठों देश हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में हैं। 650 ग्लेशियरों के खतरे में आने के बाद यहां के जनजीवन पर भारी असर पड़ने वाला है। केदारनाथ त्रासदी को भी हिमालयन सुनामी का एक रूप माना जा सकता है।

ग्लेशियर पिघलने से जुड़ी 2 खास बातें 

  • ग्लेशियर पिघलने से ऊंची पहाड़ियों में कृत्रिम झीलों का निर्माण होता है। इनके टूटने से बाढ़ की संभावना बढ़ जाती है जिससे ढलान में बसी आबादी के लिए खतरा उत्पन्न होता है। 
  • नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड तथा कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी गैसों का ग्लेशियरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है इसलिए 'ब्लैक कार्बन' की उत्सर्जन दर की भी निगरानी की जानी चाहिए। 

गंभीरता न बरती तो इन खतरों से निपटना होगा 

ग्लेशियरों के पिघलने का सबसे पहला नतीजा होगा भयानक बाढ़। जैसा कुछ साल पहले हम केदारनाथ में देख चुके थे। इसके दूरगामी नतीजे ये होंगे कि ग्लेशियर पिघलने के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ जाएगा। डेढ़ अरब से ज्यादा की आबादी के लिए भोजन पैदा होने की समस्या होगी, तापमान बढ़ने के साथ ही वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ेगा और ऊर्जा के कई साधन बहुत तेज़ी से ठप होते जाएंगे।

एक ब्रिटिश विशेषज्ञ का कहना है कि एक पीढ़ी के बदलने के दौरान ही ग्लेशियर दोगुनी तेजी से पिघलने लगे हैं। ये क्यों खतरे की घंटी है? बर्फ पिघलने का अंजाम ये होगा कि एशिया की नदियों में पानी नहीं रहेगा और सूखे के हालात बनने लगेंगे। ग्लेशियरों के पिघलने के कारण नदियों पर आश्रित करोड़ों की आबादी भयानक सूखे से जूझने के लिए मजबूर होगी।

प्रदूषण भी है ग्लेशियरों के पिघलने का कारण 

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग तो मुख्य कारण है ही, लेकिन एशियाई देशों में लकड़ी, कोयला बहुत अधिक मात्रा में जलाया जाता है। इसका धुआं सीधे आसमान में जाता है और साथ में कार्बन लेकर जाता है। इसी प्रदूषित धुएं के बादल जब पर्वतों के ऊपर छा जाते हैं, तब सोलर एनर्जी यानी सौर्य ऊर्जा को तेज़ी से अवशोषित करते हैं। इनकी वजह से पर्वत पर जमी बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। 

  • 80 करोड़ आबादी निर्भर है ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों पर भारत, चीन, नेपाल, भूटान की। इन नदियों से सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन किया जाता है। ग्लेशियर पिघल गए तो तमाम संसाधन खत्म हो जाएंगे।
  • 60 करोड़ टन बर्फ जमी हुई है हिमालय के करीब 650 ग्लेशियरों में। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव के बाद यह तीसरा बड़ा क्षेत्र है जहां इतनी बर्फ है। इसलिए हिमालयी ग्लेशियर क्षेत्र को तीसरा ध्रुव भी कहते हैं। 
  • हिमालय के निचले इलाकों में कई जगहों पर अध्ययन के अनुसार, एक साल में 16 फीट तक की बर्फ पिघल गई। 
  • 08 बिलियन टन पानी हिमालय के ग्लेशियर पिघलने से नीचे आ रहा है। इतने में 32 लाख स्विमिंग पुल भर जाएं। 
  • 08 अरब टन पानी बर्बाद हो रहा है ग्लेशियर पिघलने से हर साल। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव में बर्फ पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इससे कई छोटे द्वीपों पर खतरा बढ़ेगा।

खतरनाक है केदारनाथ मंदिर के ऊपर बन रही झील

पिछले कुछ समय से केदारनाथ के ऊपर चौराबाड़ी में बन रही झील को लेकर लगातार चर्चाएं हो रही हैं। वैज्ञानिकों ने उस झील का पता भी लगा लिया है। केदारनाथ मंदिर से करीब चार किमी ऊपर चौराबाड़ी ग्लेशियर की तलहटी में एक पुरानी झील सदियों से अस्तित्व में थी, जिसे चौराबाड़ी झील के नाम से जाना जाता था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियां इस झील में विसर्जित किए जाने के बाद इसे गांधी सरोवर के नाम से भी जाना जाता था।

2013 में केदारनाथ और सम्पूर्ण केदारनाथ घाटी में हुए जल प्रलय के लिए इस झील में जमा पानी को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार माना जाता है। कहा जाता है कि तेज बारिश के कारण चौराबाड़ी ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर चौराबाड़ी झील में गिर गया था, जिससे झील में सदियों से जमा पानी छलक कर नीचे की तरफ बहने लगा। पहाड़ी ढलान पर तेजी से बहते इस पानी ने केदारनाथ के साथ ही पूरी मंदाकिनी घाटी को तबाह कर दिया। 2013 की आपदा में चौराबाड़ी झील का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो गया था और यहां सिर्फ पत्थरों का रौखड़ बाकी रह गया था।
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