हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो कि काफी चिंताजनक है। ग्लेशियरों की स्थिति पर हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि पिछले करीब दो दशकों से इनके पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। तापमान लगातार बढ़ने के कारण हिमालय के साढ़े छह सौ ग्लेशियर संकट में हैं। इस बारे में राज्यसभा में भी चिंता जताई गई है। कांग्रेस नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने राज्यसभा में बताया कि सियाचिन और गंगोत्री सहित हिमालय क्षेत्र के करीब 10 हजार ग्लेशियर तेजी से और लगातार पिघल रहे हैं।
उपग्रह से किए गए सर्वेक्षण और एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते 15 वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हुई है। यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्र से निकलने वाली नदियों के जल स्तर में वृद्धि हुई है और यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि आने वाले समय में इस वजह से जलसंकट भी बढ़ेगा।
पृथ्वी की तस्वीरें खींचने के लिए अमेरिका ने 70 और 80 के दशक में जासूसी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे थे। उनसे मिले चित्रों को थ्रीडी मॉड्यूल में बदलकर किए गए शोध के मुताबिक 1975 से 25 वर्षों तक हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर, हर साल 10 इंच तक घट रहे थे। वह 2000 से 2016 के बीच हर साल औसतन 20 इंच तक घट रहे हैं। साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के मुताबिक करीब 800 करोड़ टन पानी का नुकसान हर साल हो रहा है।
कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने पाया है कि दो हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी पट्टी में फैले हिमालय क्षेत्र का तापमान एक डिग्री से ज्यादा तक बढ़ चुका है। इसकी वजह से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार दोगुनी हो गई है। शोधकर्ताओं ने 40 वर्षों के इन उपग्रही चित्रों का अध्ययन नासा और जापानी अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा के ताजा डेटा के विश्लेषण के साथ किया तो पाया कि कैसे हिमालय क्षेत्र बदल रहा है और कैसे 650 ग्लेशियरों पर खतरा बढ़ रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग तो मुख्य कारण है ही, लेकिन एशियाई देशों में लकड़ी, कोयला बहुत अधिक मात्रा में जलाया जाता है। इसका धुआं सीधे आसमान में जाता है और साथ में कार्बन लेकर जाता है। इसी प्रदूषित धुएं के बादल जब पर्वतों के ऊपर छा जाते हैं, तब सोलर एनर्जी यानी सौर्य ऊर्जा को तेज़ी से अवशोषित करते हैं। इनकी वजह से पर्वत पर जमी बर्फ तेजी से पिघलने लगती है।