बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाताओं के नाम हटाने पर रोक लगाने का कोई तत्काल अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने कहा कि एसआईआर से जुड़े मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। ऐसे में हाईकोर्ट के लिए समान मुद्दे पर समानांतर कार्यवाही करना या कोई आदेश देना उचित नहीं होगा।
अदालत वंचित बहुजन आघाड़ी के युवा विंग के अध्यक्ष सागर रमेश गवई की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने महाराष्ट्र में एसआईआर के तहत घर-घर जाकर मतदाताओं के सत्यापन के दौरान प्रक्रिया के उल्लंघन और मनमाने तरीके से नाम हटाए जाने का आरोप लगाया है। याचिका में पारदर्शिता और जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है। साथ ही, एकतरफा तरीके से मतदाताओं के नाम हटाने का विरोध किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में 8 अक्तूबर को सुनवाई
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष कुंभकोणी ने पीठ को बताया कि एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में 8 अक्तूबर को सुनवाई होनी है। यह मामला महाराष्ट्र के साथ अन्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से भी जुड़ा है। इसके बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इसी मुद्दे पर समानांतर सुनवाई करना न्यायिक औचित्य के अनुरूप नहीं होगा।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश प्रकाश आंबेडकर ने मतदाता सूची से आगे किसी भी नाम को हटाने पर रोक लगाने के लिए अंतरिम आदेश की मांग की। हालांकि, पीठ ने इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से हाईकोर्टों से एसआईआर के मुद्दे पर समानांतर कार्यवाही नहीं करने को कहा है। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह बाद के लिए तय की है। याचिका में यह भी मांग की गई है कि मतदाता का नाम हटाने से पहले निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी औपचारिक सुनवाई करे और कारणों वाला आदेश जारी करे।
एसआईआर में ड्राफ्ट सूची से बाहर मतदाता 'कैच-22' की स्थिति में: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने सोमवार को कहा कि SIR के तहत तैयार ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर रह गए मतदाता "कैच-22" की स्थिति में फंस गए हैं, क्योंकि निर्वाचन आयोग पुरानी मतदाता सूचियों का संदर्भ नहीं ले रहा है। न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जमसांडेकर की पीठ ने कहा कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची से बाहर नहीं होना चाहिए। पीठ गोवा निवासी परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्यों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं के नाम एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बाहर रह गए हैं।
'ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं तो सुनवाई से कैसे इनकार करेंगे'
अदालत ने कहा कि जब किसी मतदाता को निर्वाचन आयोग की ओर से नोटिस मिलता है और वह आयोग के पास जाकर बताता है कि उसने अपना निवास स्थान बदल लिया है, तो वह फॉर्म-8 जमा कर सकता है। अदालत ने कहा, आप उससे यह नहीं कह सकते कि मैं आपकी बात नहीं सुनूंगा, क्योंकि सिस्टम इसकी अनुमति नहीं देता और उसका नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है।
पीठ ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 में जिस मतदाता सूची का उल्लेख है, वह मौजूदा सूची है, न कि ड्राफ्ट सूची।
अदालत ने कहा, "सब कुछ मौजूदा सूची के आधार पर देखा जाना चाहिए। वरना मतदाता के पास इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं है। यह उसके लिए पूरी तरह 'कैच-22' की स्थिति है।" पीठ ने कहा कि ड्राफ्ट सूची से मतदाता का नाम हटाने का मतलब प्रभावी रूप से मौजूदा सूची से भी उसका नाम हटाना है। पात्र मतदाता को सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।