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Corona lockdown: अभिभावक बच्चों के लिए घर में ही उठाएं रचनात्मक कदम

Sun, 29 Mar 2020 05:34 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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घर पर बच्चे पढ़ते हुए - फोटो : पीटीआई
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कोरोना और लॉकडाउन के चलते घर में कैद हो चुके बच्चों की चिंता केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को भी सताने लगी है। इसी को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने बंगलुरू के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस (एनआईएमएचएएनएस) के साथ करार किया है।

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स्वास्थ्य मंत्रालय की इस कोशिश के बाद एनआईएमएचएएनएस के बाल व किशोर विभाग के प्रो. शेखर पी शेषाद्री ने बताया कि लॉकडाउन के चलते बच्चों का रूटीन खराब होता है। बच्चे बार-बार सवाल पूछते हैं कि ये सब कब खत्म होगा। ऐसी स्थिति में आसान जवाब दें वायरस के डर के बारे में न बताएं। इस स्थिति में अभिभावकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों का रूटीन कैसे तैयार करते हैं जिससे उसका मन लगा रहे। आइए जानते हैं आप बच्चों के लिए क्या कर सकते हैं। ब्यूरो

रचनात्मक तरीके से घर में कराएं स्कूल का काम
बच्चों से घर में रचनात्मक तरीके से एक से दो घंटे स्कूल का काम कराएं। उन्हें किसी न किसी तरह से बहला कर रखें जिससे उनका मन लगा रहे। परिवार के संग समय बिताएं और सभी लोग एकसाथ घर में कुछ खेल खेलें।

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परिवार के बीच वक्त बिताने का बेहतर समय

ये समय परिवार के बीच वक्त बिताने का बेहतर समय है। बच्चों को कहानियां सुनाएं, घर-परिवार से जुड़ी पुरानी बातें उन्हें कहानी के तौर पर बताएं ताकि उनके भीतर उसको जानने और समझने की रुचि बनी रहे।

सूची बनाएं, जो आप करना चाहते हैं

लोगों को उसकी सूची बनानी चाहिए जो वो करना चाहते हैं। रिवार के बारे में रोचक जानकारियां या माता-पिता के बारे में जो कुछ नहीं जानते हैं उसके बारे में बताएं। इस वक्त पूरा परिवार साथ है और इसी से घबराहट दूर होगी।

बच्चों को बताएं ये सब अस्थायी है

बच्चों को बताएं की ये सब अस्थायी है। सब कुछ जल्द ही सामान्य हो जाएगा। ऐसा करेंगे तो उनके भीतर इस बात की खुशी होगी कि आने वाले समय में उनके पुराने दिन वापस आ जाएंगे।

मानसिक बीमारी होने का खतरा है

स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ बच्चों और अन्य लोगों को लॉकडाउन के बीच स्वस्थ रखने के लिए तरकीब पर काम कर रहे हैं। इसके लिए अलग-अलग उम्र के लोगों को हमने इस श्रेणी में रखा है। हमें इस बात का डर है कि कोरोना के डर से लोगों में कहीं मानसिक रोग न हो जाएं। हम इस स्थिति को रोकना चाहते हैं। -डॉ. बीएन गंगाधर, निदेशक, एनआईएमएचएएनएस
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