प्रशांत किशोर ने कहा है कि अरविंद केजरीवाल को देश के प्रमुख राष्ट्रीय दल की भूमिका में आने में 15 से 20 साल का समय लग सकता है। लेकिन लगता है कि अरविंद केजरीवाल के पास इतना समय नहीं है। वे जल्द से जल्द कांग्रेस को हटाकर देश के प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका हासिल कर लेना चाहते हैं। इसके लिए केजरीवाल राजनीति के हर वो दांव-पेंच आजमाने की कोशिश कर रहे हैं जो देश के प्रमुख विपक्षी दल अब तक आजमाते आए हैं। वे प्रमुख राज्यों में न केवल अपनी पार्टी को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस के उन नेताओं को तोड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं जो किसी कारणवश अपनी पार्टी से नाराज हैं और एक विकल्प की तलाश कर रहे हैं।
कभी यह फॉर्मूला अमित शाह का ट्रंप कार्ड माना जाता था। दूसरे दलों के नेताओं को तोड़कर अपना किला मजबूत कर चुनाव जीतने की अपनी इसी रणनीति पर चलते हुए अमित शाह ने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, असम, गोवा, मणिपुर और अन्य राज्यों में कमल खिलाने में सफलता पाई थी। अब आम आदमी पार्टी भी उसी रणनीति पर चलने की कोशिश कर रही है। चर्चा है कि आम आदमी पार्टी गुजरात, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक जैसे अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के विभिन्न असंतुष्ट नेताओं से संपर्क करने की कोशिश कर रही है। क्या यह रणनीति अरविंद केजरीवाल के लिए भी कारगर साबित होगी?
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडे ने अमर उजाला से कहा कि सियासत की जमीन पर हमेशा कोई सेट फॉर्मूला काम नहीं करता। स्वयं अरविंद केजरीवाल का दिल्ली की राजनीति में सफल होना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उन्होंने शीला दीक्षित की उस सरकार को हराने में सफलता पाई थी, जो अपने शानदार कामकाज के लिए अब तक याद की जाती है। आम आदमी पार्टी और असम गण परिषद की तरह इस देश में अचानक पार्टी बनाकर राज्य स्तर पर कई दल सफल हो चुके हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प बनने के लिए एक बड़ी तैयारी की आवश्यकता होती है।