कुपोषण-ड्रॉप आउट गंभीर पर मुद्दा नहीं : देश के सबसे विकसित राज्यों में से एक गुजरात में कुपोषण और ड्रॉप आउट राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। यह राज्य इन मामलों में कई गरीब राज्यों से भी पीछे हैं। बावजूद इसके चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है।
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सियासत के वर्तमान दौर में महिला सशक्तीकरण सभी दलों का मुख्य नारा है। गुजरात में सियासी दलों का महिला सशक्तीकरण का नारा और दावा महज छलावा प्रतीत होता है। साफ दिखता है कि कोई भी दल आधी आबादी को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए गंभीर नहीं है। विधानसभा चुनाव में इस बार भी टिकटों में प्रमुख दलों ने महिलाओं की उपेक्षा ही की है।
महिला सशक्तीकरण की बात करने वाली भाजपा ने 182 सीटों में महज 17 पर ही महिलाओं को उतारा है। वहीं, कांग्रेस ने सिर्फ 14 महिलाओं को मौका दिया है। आम आदमी पार्टी व एआईएमआईएम के नौ उम्मीदवार मिलाकर चार प्रमुख दलों के महिला उम्मीदवारों की संख्या महज 40 है। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस से महज 22 महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में थीं।
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कुपोषण-ड्रॉप आउट गंभीर पर मुद्दा नहीं : देश के सबसे विकसित राज्यों में से एक गुजरात में कुपोषण और ड्रॉप आउट राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। यह राज्य इन मामलों में कई गरीब राज्यों से भी पीछे हैं। बावजूद इसके चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है।
शुरू से उपेक्षा
-साल 1960 से 2017 तक 57 सालों में राज्य में 13 चुनाव हुए। अब तक महज 107 महिलाएं ही विधानसभा की दहलीज लांघ पाईं। 1972 व 1975 में कोई महिला विधानसभा नहीं पहुंची।
-62 साल में बस एक महिला सीएम
-62 साल में बस आनंदी बेन पटेल को महज सवा दो साल के लिए सीएम बनने का अवसर मिला। मंत्रिमंडल में कई बार कोई महिला नहीं थी। अब भी सिर्फ दो महिला मंत्री हैं। बीते 13 चुनावों में सात बार महिला विधायकों की संख्या दहाई अंक तक नहीं पहुंच पाई।