अदालत ने कहा कि तीनों को भारत में रोजगार मिला लेकिन उनका प्यार और देशभक्ति पाकिस्तान के लिए थी। अदालत ने कहा कि भारत में बैठे और भारत के नागरिक के रूप में पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले व्यक्ति को स्वेच्छा से देश छोड़ देना चाहिए या सरकार को उनकी तलाश करनी चाहिए और उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए।
इन आरोपियों को ठहराया गया दोषी
अदालत ने सिराजुद्दीन अली फकीर (24 वर्षीय), मोहम्मद अयूब (23 वर्षीय) और नौशाद अली (23 वर्षीय) को 2012 के मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), सरकारी गोपनीयता अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत आपराधिक साजिश रचने और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोपों में दोषी ठहराया।
इन धाराओं के तहत सुनाई गई सजा
तीनों को आईपीसी की धारा 121, 121 (ए) और 120 (बी) और आईटी अधिनियम की धारा 66 (एफ) के तहत आजीवन कारावास, साथ ही सरकारी गोपनीयता अधिनियम की धारा 3 के तहत 14 साल के कठोर कारावास और आईपीसी की धारा 123 (युद्ध छेड़ने के इरादे से छिपाना) के तहत दस साल की जेल की सजा सुनाई गई। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
11 साल पहले गिरफ्तार हुए थे फकीर औऱ अयूब
अहमदाबाद शहर की अपराध शाखा ने जमालपुर इलाके के निवासी फकीर और अयूब को 14 अक्तूबर 2012 को अहमदाबाद और गांधीनगर सैन्य छावनी में सैन्य ठिकानों से संबंधित गोपनीय सूचना आईएसआई को देने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
सैन्य छावनी और बीएसएफ मुख्यालय के बारे में दे रहा था सूचना
एक अन्य आरोपी और जोधपुर निवासी नौशाद अली को दो नवंबर 2 को जोधपुर सैन्य छावनी और बीएसएफ मुख्यालय के बारे में सूचना देने के आरोप में पकड़ा गया था। जामनगर स्थित एक संदिग्ध आईएसआई एजेंट को भी गिरफ्तार किया गया है। हालांकि, उसे फरवरी 2013 में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 169 के तहत सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। बाद में वह मामले में सरकारी गवाह बन गया।
2007 में पाकिस्तान गया था आरोपी फकीर
आरोपपत्र के मुताबिक, फकीर, अयूब और अली ने मसौदों में संदेश सहेजे ताकि पाकिस्तानी अधिकारी ईमेल का उपयोग करके उन तक पहुंच सकें। अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी फकीर 2007 में पाकिस्तान गया था और तैमूर नाम के एक व्यक्ति से मिला था। अली ने 2009 में पड़ोसी देश में आईएसआई एजेंटों से मुलाकात की थी। पुलिस ने फकीर के आवास से अहमदाबाद स्थित सैन्य छावनी का नक्शा बरामद किया था।
'जासूसी करने वाले स्वेच्छा से छोड़ दें देश'
अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक होने के बावजूद तीनों ने पाकिस्तान के फायदे के बारे में सोचा। अदालत ने कहा, 'दरअसल, एक व्यक्ति जो भारत में बैठा है और भारत के नागरिक के रूप में पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहा है, उसे स्वेच्छा से देश छोड़ देना चाहिए और पाकिस्तान चले जाना चाहिए या सरकार को उनकी तलाश करनी चाहिए और उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए।'
'सभी आरोपियों में देश के प्रति प्रेम नहीं'
उन्होंने कहा, 'सभी आरोपी भारत के नागरिक हैं और उन्हें भारत में रोजगार मिला है। लेकिन देश के प्रति कोई प्रेम या देशभक्ति की भावना नहीं है। इसके बजाय, उन्हें पाकिस्तान के लिए प्यार, स्नेह और देशभक्ति मिली है, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने लगातार तीन वर्षों तक पाकिस्तान में आईएसआई को भारतीय सेना की गतिविधियों के बारे में गुप्त जानकारी भेजी और दुबई से लाखों रुपये प्राप्त किए।'
'आरोपियों ने 140 करोड़ लोगों के हितों के बारे में नहीं सोचा'
अदालत ने कहा कि तीनों के कृत्य ने भारत की अखंडता और संप्रभुता को नुकसान पहुंचाया है, और एक नहीं बल्कि पूरा देश उनके कृत्य का शिकार है जो अपराध की गंभीरता को बढ़ाता है। उन्होंने कहा, 'भारतीय नागरिक होने के बावजूद उन्होंने पाकिस्तान के फायदे के बारे में सोचा। उन्होंने भारत के 140 करोड़ लोगों की सुरक्षा के बारे में नहीं सोचा बल्कि अपने और पाकिस्तान के हितों के बारे में सोचा।'
न्यायाधीश ने कहा कि मेरा मानना है कि देश में रहकर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों को कम सजा देना भी राष्ट्र विरोधी गतिविधि माना जाना चाहिए। अभियोजन पक्ष ने गोपनीय और गोपनीय सूचना के बारे में भारतीय सेना की पूर्व अनुमति ली थी। गुजरात और केंद्र सरकार ने भी तीनों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी थी।