गुजरात विधानसभा में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया। मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोपों को लेकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के विधायकों ने सरकार को घेरा। बहस उस समय शुरू हुई जब भाजपा सरकार ने मतदाता सूची संशोधन पर हुए खर्च को नियमित करने के लिए अनुपूरक विनियोग विधेयक सदन में पेश किया।
विपक्ष ने आखिर क्या आरोप लगाए?
विपक्षी विधायकों ने दावा किया कि राज्यभर में बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा कर मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई। उनका आरोप था कि कई लोगों को बिना जानकारी के उनके नाम हटाने के आवेदन दाखिल किए गए। कांग्रेस विधायक अमित चावड़ा ने कहा कि लोकतंत्र में मतदान का अधिकार सबसे अहम है और यदि प्रशासनिक स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो विधानसभा में उसकी जांच जरूरी है।
क्या चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर उठा सवाल?
वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने सदन में प्वाइंट ऑफ ऑर्डर उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसके कामकाज पर विधानसभा में चर्चा नहीं हो सकती। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची तैयार करने और संशोधन का पूरा अधिकार चुनाव आयोग के पास है। भाजपा विधायक रमणलाल वोरा ने भी इस तर्क का समर्थन किया।
फॉर्म-7 विवाद को लेकर क्या बड़े आरोप लगे?
- विपक्ष ने कहा कि अचानक हजारों फॉर्म-7 आवेदन दाखिल हुए।
- कई आवेदनों में जरूरी दस्तावेज नहीं होने का आरोप लगाया गया।
- कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्होंने खुद आवेदन नहीं दिया था।
- जिग्नेश मेवाणी ने आरोप लगाया कि लाखों लोगों के नाम हटाने की कोशिश हुई।
- घुमंतू और डीएनटी समुदाय के मताधिकार प्रभावित होने की आशंका जताई गई।
स्पीकर ने बहस पर क्या फैसला सुनाया?
विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कहा कि चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा नहीं की जा सकती। हालांकि उन्होंने राज्य मशीनरी से जुड़ी प्रशासनिक कमियों और खर्च से जुड़े मुद्दों पर सीमित चर्चा की अनुमति दी। उन्होंने चेतावनी दी कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर सवाल नहीं उठाए जाएं।
सरकार ने आरोपों पर क्या जवाब दिया?
वित्त मंत्री कनुभाई देसाई ने कहा कि फॉर्म-7 मतदाता सूची से नाम हटाने की निर्धारित प्रक्रिया है, लेकिन केवल आवेदन देने से नाम नहीं हटाया जाता। उन्होंने बताया कि बूथ लेवल अधिकारी अनिवार्य जांच करते हैं और जरूरत पड़ने पर सुनवाई भी होती है। अंतिम फैसला पूरी प्रक्रिया के बाद ही लिया जाता है।
मताधिकार को लेकर राजनीतिक टकराव क्यों बढ़ा?
कांग्रेस विधायक शैलेष परमार ने कहा कि जब राज्य के खजाने से SIR पर खर्च किया जा रहा है तो विधानसभा को इसकी समीक्षा करने का अधिकार है। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया, जबकि सरकार ने प्रक्रिया को पूरी तरह संवैधानिक बताया। इस मुद्दे ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया।
लंबी बहस और तीखी नोकझोंक के बाद गुजरात अनुपूरक विनियोग विधेयक 2026 ध्वनिमत से पारित हो गया। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने विधेयक का समर्थन नहीं किया। हालांकि मतदाता सूची संशोधन को लेकर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने के संकेत मिल रहे हैं।