आसमान से देखने पर मराठवाड़ा भले ही हरा-भरा दिख रहा है लेकिन हकीकत जमीन पर उतरते ही तस्वीर बदल जाती है। खेतों में खड़ी सोयाबीन पीली पड़ चुकी है, कपास की पैदावार रुक गई है, अरहर मुरझा गई है और गन्ना अपनी सामान्य उंचाई तक पहुंचने से पहले ही सूखने लगा है। महाराष्ट्र में मराठवाड़ा के तीन जिले लातूर, बीड और धाराशिव के आसपास के इलाकों में बारिश की बेरुखी ने खरीफ की उम्मीदों को झुलसा दिया है। 80 फीसदी फसलें सूख चुकी हैं। जाहिर है कि किसान बड़े संकट में हैं। पूरे हालात पर नजर डालती ये रिपोर्ट।
मराठवाड़ा। लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव सबसे ज्यादा सूखे से प्रभावित जिले हैं जहां जून से सितंबर के दौरान सामान्य बारिश 679.5 के मुकाबले सिर्फ 424.5 मिलीमीटर हुई। सूखे का यह संकट सिर्फ खेत तक सीमित नहीं है। इसका असर पशुओं के चारे, ग्रामीण मजदूरी, घरेलू आमदनी और अगली फसल के लिए जरूरी पूंजी पर दिखाई देने लगा है।
हगदल गांव के बालाजी मुंडे गन्ने के खेत की ओर इशारा करते हैं। वे बताते हैं कि गन्ना सामान्यतया 20 से 25 फुट तक होता है लेकिन इस बार यह 10 से 12 फुट पर ही रुक गया है और सूख रहा है। मुंडे कहते हैं कि 2025 में अधिक बारिश ने परेशान किया और इस साल बारिश के अभाव ने संकट में ला दिया है। सावरगांव रोकड़े के राम बेल्लाडे सोयाबीन, अरहर और ज्वार उगाते हैं।
लातूर और बीड जिले में तालाबों में बेहद कम पानी बचा है। माजरा नदी लातूर की जीवनवाहिनी है। लातूर शहर से करीब 70 किमी दूर धाराशिव और बीड की सीमा के पास स्थित माजरा बांध का जलस्तर बेहद नीचे तक पहुंच चुका है। लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसत स्टोरेज करीब 12.5 प्रतिशत रह गया है।
लातूर और आसपास के किसानों की बातचीत में 1972 का साल बार-बार सामने आता है। पूर्व जिला परिषद सदस्य त्र्यंबक नारायण गुट्टे इसे 1972 के बाद की सबसे गंभीर सूखा परिस्थितियों में से एक मानते हैं। संकट के संकेत मानसून के शुरुआती महीनों में ही दिखाई देने लगे थे। अब संकट के तीन चरण सामने हैं। पहले बुआई का संकट, फिर फसल बचाने का संकट और अब किसानों के सामने फसल हटाने और अगली खेती के लिए पूंजी जुटाने का संकट सामने है।
महाराष्ट्र सरकार ने सूखा प्रभावित इलाकों में राहत प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। सितंबर के अंत में सूबे के 265 तालुकों के बाद 43 तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में जोड़ा गया है। वहीं, फसल नुकसान के पंचनामें और पानी-चारे की व्यवस्था जैसे उपायों पर चर्चा हुई है।
अधिकारियों का कहना है कि सूखे से निपटने में सरकारी खजाने पर 50 हजार करोड़ का बोझ बढ़ सकता है। लेकिन, खेतों में खड़े किसानों को फसल नुकसान की भरपाई, पानी-चारे की व्यवस्था जैसे उपायों के अलावा अगली फसल तक परिवार चलाने के लिए आय के सहारे की सख्त जरूरत है।