अस्थमा मरीजों के लिए जल्द ऐसा ग्रीन इनहेलर आ सकता है, जिसका पर्यावरण पर असर मौजूदा इनहेलर से काफी कम होगा। नई तकनीक से कार्बन उत्सर्जन 90 फीसदी से ज्यादा घट सकता है। आखिर कैसे बदलेगा इनहेलर और पर्यावरण को कितना फायदा होगा? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
अस्थमा के मरीजों की सांस आसान करने वाला इनहेलर अब पर्यावरण पर भी कम बोझ डालेगा। देश में पहली बार कम ग्लोबल वार्मिंग असर वाले ग्रीन इनहेलर को बाजार में लाने की दिशा में कदम बढ़ा है।
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केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की विशेषज्ञ समिति ने दवा कंपनी लुपिन के ऐसे मीटर-डोज इनहेलर के निर्माण और बाजार में उतारने की सिफारिश की है, जिसमें मौजूदा एचएफए-134ए की जगह एचएफए-152ए प्रोपेलेंट गैस इस्तेमाल होगी।
मौजूदा इनहेलर में इस्तेमाल एचएफए-134ए एक ग्रीनहाउस गैस है और वातावरण में गर्मी रोककर जलवायु पर असर डालती है। इसके मुकाबले एचएफए-152ए का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल काफी कम है।
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उपलब्ध शोध के मुताबिक, एचएफए-152ए वाले मीटर-डोज इनहेलर से कार्बन उत्सर्जन में मौजूदा एचएफए-134ए की तुलना में 90 फीसदी से अधिक कमी आ सकती है।
एचएफए-152ए वाले मीटर-डोज इनहेलर को दुनिया में पहली नियामकीय मंजूरी ब्रिटेन ने जुलाई 2026 में दी थी। अब भारत दुनिया का दूसरा देश है, जहां विशेषज्ञ समिति ने इसके इस्तेमाल की सिफारिश की है। इनहेलर से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान का अंदाजा अमेरिका के एक अध्ययन से लगाया जा सकता है।
इसके अनुसार, 2014 से 2024 के बीच अमेरिका में इनहेलर से 2.49 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ। इसमें करीब 98 फीसदी उत्सर्जन मीटर-डोज इनहेलर से हुआ।