कृष्ण ने कहा कि आदिवासी कारीगरों को प्रशिक्षण दिया जाएगा और उनसे खुद को वेबसाइट पर विक्रेता को रूप में पंजीकृत करने को कहा जाएगा। उन्होंने कहा, देश भर में हमारे 15 क्षेत्रीय कार्यालयों के कर्मचारी और ट्राइफेड के साथ काम करने वाले राज्य सरकार के अधिकारी इन आदिवासियों कारीगरों को प्रशिक्षित करेंगे और उन्हें इस ई प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत होने में मदद करेंगे।
उन्होंने कहा कि इस पहल का मकसद लगभग पांच लाख आदिवासी कारीगरों को ऑनलाइन लाना है और उन्हें एक बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ना है। इस वेबसाइट पर पकड़े, चित्र, घर की सजावट के सामान, गहने और धातु शिल्प समेत 20 हजार श्रेणियों के करीब पांच लाख उत्पाद उपलब्ध होंगे। इन उत्पादों की गुणवत्ता की पूरी जांच की जाएगी और एक समिति उनका मूल्य तय करेगी।
उन्होंने कहा कि उत्पादों की बिक्री से मिले हर 100 रुपये में से 70 रुपये आदिवासी विक्रेता के खाते में जाएंगे। कृष्ण ने बताया कि इन उत्पादों की देशभर में आपूर्ति के लिए स्थानीय संग्रह केंद्र बनाए जाएंगे। हम 30 जुलाई को लगभग पांच हजार आदिवासी कारीगरों के साथ शुरुआत करेंगे। उन्होंने कहा कि यह प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर भारत मिशन का एक हिस्सा है। हमारा मकसद 'गो लोकल फॉर वोकल, गो ट्राइबल' है।
कृष्ण ने इस पहल के पीछे की अर्थव्यवस्था समझाते हुए कहा कि आदिवासी कारीगर जो शर्ट स्थानीय बाजार में 200 रुपये में बेचते हैं वही शर्ट दिल्ली में 1000 रुपये में बिकती है। ग्राहकों को सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाले जैविक (ऑर्गेनिक) उत्पाद बेचे जाएंगे। अगर ग्राहक उत्पाद से संतुष्ट नहीं है तो उसके पास 15 दिन के अंदर उत्पाद वापस करने का भी विकल्प होगा।