मसौदा नीति में कहा गया है कि इन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में मरीजों के खर्च की लागत ऑनलाइन चंदे के जरिये जुटाई जाएगी। नीति के मुताबिक, सरकार स्वैच्छिक व्यक्तिगत और कॉर्पोरेट दाताओं से दुर्लभ बीमारियों के रोगियों की उपचार लागत में आर्थिक मदद लेने के लिए एक डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से वैकल्पिक फंडिंग सिस्टम बनाएगी।
2017 में भी जारी की थी नीति
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इससे पहले जुलाई, 2017 में भी नेशनल पॉलिसी फॉर ट्रीटमेंट ऑफ रेयर डिजीज (एनपीटीआरडी) जारी की थी। लेकिन उसमें फंडिंग आदि की स्पष्टता नहीं होने के चलते राज्य सरकारों की तरफ से ऐतराज जताया गया था। इसके बाद नवंबर 2018 में सरकार ने इस पर पुनर्विचार के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन कर दिया था।
ऐसा था खर्च का आकलन
- 10 किग्रा तक के शिशु की दुर्लभ बीमारी के इलाज में 10 लाख से 1 करोड़ रुपये तक हर साल होते हैं खर्च
- 450 बीमारियां ही सरकारी अस्पतालों में दर्ज की गई हैं अभी तक भारत में दुर्लभ श्रेणी के तहत