लंबी चर्चा के बाद सरकार ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों का कार्यकाल एक साल निश्चित करने की सिफारिश ठुकरा दी है। सरकार की चिंता है कि वरिष्ठता और शानदार उपलब्धियों के बावजूद सेवानिवृत्ति के कगार पर जज कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के कार्यकाल संबंधी संशोधित मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) में कानून विभाग ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल दो साल निश्चित करने का प्रस्ताव रखा था।
गौरतलब है कि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार से एक एमओपी बनाने को कहा था। इसी के तहत मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल को निश्चित करने का सुझाव दिया गया था। अब इस संशोधित एमओपी पर सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला कोलेजियम विचार करेगा। एक निश्चित और लंबे कार्यकाल के पीछे विभाग की सोच थी कि इससे मुख्य न्यायाधीशों को प्रशासकीय मदद हासिल होगी और मामलों के प्रबंधन में भी सुधार होगा। लेकिन विभाग के इस प्रस्ताव को कानून मंत्रालय ने घटाकर एक साल कर दिया था।
मंत्रालय का मानना था कि दो वर्ष की अवधि बहुत लंबी है और यह व्यावहारिक नहीं है। आमतौर पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष और हाई कोर्ट में 62 वर्ष है। निश्चित कार्यकाल को अंतिम रूप देने का मसला मंत्री समूह की एक बैठक में रखा गया, जिसकी अध्यक्षता विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने की थी।
बैठक में मंत्री समूह के कुछ सदस्यों ने निश्चित कार्यकाल की वकालत की, बाकी ने इसका विरोध किया। विरोध करने वाले मंत्रियों का कहना था कि जो जज सेवानिवृत्ति के करीब हैं, वे एक साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सकेंगे। कार्यकाल निश्चित न करने का एक तर्क यह भी दिया गया कि इससे अन्य जजों की नियुक्ति रुक जाएगी। आखिरकार, मंत्री समूह ने निश्चित कार्यकाल के नियम को एमओपी में से हटा दिया।