एससी/एसटी के फर्जी प्रमाण पत्र बनवा कर केंद्र सरकार में पक्की नौकरी ली जा रही है। बताया जा रहा है कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवार कुछ राज्यों की लचर सत्यापन प्रक्रिया का फायदा उठाकर एससी/एसटी समुदाय से होने का प्रमाण पत्र हासिल कर लेते हैं। एससी/एसटी समुदायों के कल्याण के लिए बनी संसदीय स्थायी समिति ने इस तरह के मामलों पर गहरी चिंता जताई है।
समिति के हस्तक्षेप के बाद डीओपीटी ने गत दिनों सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि एससी/एसटी के लिए आरक्षित पदों पर जो भी नियुक्तियां हो रही हैं, उन उम्मीदवारों की जाति अथवा समुदाय के प्रमाण पत्र की सत्यापन जांच तय समय पर हो जाए। देखने में आया है कि राज्यों की तरफ से यह सत्यापन रिपोर्ट समय पर नहीं भेजी जा रही। केंद्र सरकार में तमिलनाडु के एससी/एसटी उम्मीदवार, जिन्होंने आरक्षित पदों पर नौकरी ली है, उनकी जाति या समुदाय के प्रमाण पत्रों की सत्यापन रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है। नतीजा, केंद्र सरकार ने ऐसे सभी कर्मियों के पेंशन लाभ रोक दिए हैं।
सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजे गए पत्र में डीओपीटी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले और अभी तक जारी निर्देशों का हवाला दिया है। जिन कर्मियों की जाति से संबंधित प्रमाण पत्रों की सत्यापन जांच अभी तक लंबित है, उनके पेंशन लाभ रोक दिए गए हैं। राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों से कहा गया है कि सत्यापन जांच उनकी एक अहम जिम्मेदारी है। वजह, जाति प्रमाण पत्र उनके द्वारा ही जारी किए जाते हैं और उनका सत्यापन भी वही करते हैं।
ऐसे में उनके द्वारा इस कार्य में देरी करना ठीक नहीं है। इसके चलते उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया से लेकर उनके करियर में कई तरह की दिक्कतें आ जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 'कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त' केस में 2 सितंबर 1994 को दिए अपने फैसले में विस्तृत गाइडलाइन जारी की थी, ताकि कोई भी व्यक्ति एससी/एसटी का फर्जी प्रमाण पत्र बनवा कर उसके आधार पर केंद्र की सरकारी नौकरी न हथिया सके।
इस तरह के मामलों में कहा गया है कि कई बार चयन कमेटी भी समय पर अपना काम पूरा नहीं करती। प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराने के लिए उन्हें देरी से राज्य सरकारों के पास भेजा जाता है। वे जानबूझकर इस प्रक्रिया में देरी करती हैं। यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है। सर्वोच्च अदालत ने एक माह के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने के लिए कहा था।
डीओपीटी का कहना था कि इस बाबत समय-समय पर राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। सबसे पहले 30 अक्तूबर 1975 को जारी निर्देशों में कहा गया था कि जिन उम्मीदवारों ने आरक्षित पदों की श्रेणी में नौकरी ली है, उन्हें प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा। संबंधित भर्ती एजेंसी/आयोग उनके प्रमाण पत्र देखकर यह निर्णय लेंगे कि फलां नौकरी के लिए उन उम्मीदवारों का क्लेम बनता है या नहीं। अगर कोई उम्मीदवार तय समय पर एससी/एसटी होने का प्रमाण पत्र पेश नहीं कर पाता है, तो उसकी नियुक्ति को प्रोविजनल श्रेणी में रख दिया जाता था।
डीओपीटी ने उस दौरान यह भी कहा था कि अगर कोई अथॉरिटी प्रमाण पत्रों की जांच-पड़ताल कराने में देरी करती है, तो संबंधित मंत्रालय या विभाग सीधे डीएम से संपर्क कर उम्मीदवार का क्लेम सत्यापित करा सकते हैं। इसके बाद 27 फरवरी 1981 को डीओपीटी द्वारा एक अन्य निर्देश जारी किया। इसमें कहा गया कि कोई उम्मीदवार हिंदू धर्म या सिख धर्म के अलावा दूसरा धर्म अपना लेता है तो उस स्थिति में वह अपना एससी/एसटी स्टेटस खो सकता है।
डीओपीटी ने 20 मार्च 2007 को एक नया पत्र सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को भेजा। इसमें डीएम/डीसी को हिदायत दी गई कि वे अपने स्तर पर उक्त प्रमाण पत्रों का सत्यापन सुनिश्चित करें। एक माह के भीतर प्रमाण पत्रों एवं दूसरे दस्तावेजों की जांच कर उन्हें संबंधित अथॉरिटी के पास वापस भेज दें। डीओपीटी ने 11 अप्रैल 2012 को जारी निर्देशों में कहा, सभी राज्यों को सख्ताई से इनका पालन करना चाहिए।
रेलवे में कार्यरत एससी/एसटी कर्मियों के कल्याण के लिए बनी संसदीय स्थाई समिति ने 14वीं लोकसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इसमें कहा गया कि एससी/एसटी होने के फर्जी प्रमाण पत्र जारी कराकर सरकारी नौकरी हासिल कर ली जाती है। ऐसे मामले में रेलवे मंत्रालय को सख्त कदम उठाना होगा। जिला उपायुक्तों से बात करनी चाहिए। इसमें डीओपीटी को साथ रखा जाए, क्योंकि डीसी/डीएम जैसे अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी डीओपीटी ही है। जाति प्रमाण पत्र की सत्यापन जांच के लिए जिला स्तर पर कमेटी गठित की जाए। वह कमेटी अच्छे से छानबीन करने के बाद ही एससी/एसटी का प्रमाण पत्र जारी करे।