प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार प्रवासी भारतीय दिवस का भी राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है। विदेश मंत्रालय की दशकों से रिपोर्टिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार के अनुसार यह एक नई परंपरा पड़ रही है। रंजीत का कहना है कि प्रवासी भारतीय दिवस के बहाने हिंदुत्व का संदेश देने की कोशिश हो रही है। जबकि प्रवासी भारतीयों के लिए होने वाले समारोह को ऐसी राजनीतिक सोच से दूर रखा जाना चाहिए।
कुमार ने पहले
प्रवासी भारतीय दिवस से लेकर लगातार प्रवासी भारतीय दिवस कार्यक्रम की रिपोर्टिंग की है। उनका कहना है कि प्रवासी भारतीय दिवस समारोह में बड़ी संख्या में खाड़ी देशों तथा दुनिया के देशों से अल्पसंख्यक समुदाय के भारतवंशी आते हैं। लेकिन इस बार इसका आयोजन वाराणसी में गंगा आरती से लेकर धर्म की थीम पर हो रहा है। प्रवासी भारतीयों को इलाहाबाद के संगम में कुंभ मेले में ले जाया जाएगा। इस तरह से कार्यक्रम का पूरा ताना-बाना हिंदुत्व को ध्यान में रखकर बुना गया है। रंजीत का कहना है कि इसके चलते प्रवासी भारतीय दिवस 2019 में अल्पसंख्यक भरतवंशियों की संख्या बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है।
गांधी को ही भूल गई सरकार
एक अन्य पत्रकार के अनुसार प्रवासी भारतीय दिवस का आधार राष्ट्रपिता
महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने के दिन को बनाया गया था। यह फैसला तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का था। पत्रकार के इस तर्क पर उत्तर प्रदेश सरकार के अफसर ने भी टिप्पणी की। सूत्र का कहना है कि कुंभ, अर्ध कुंभ या माघ मेला तो इलाहाबाद में पहले भी लगता रहा है। हर साल गणतंत्र दिवस मनाया जाता है लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने काफी सोच समझ कर इसे राष्ट्रपिता के साथ जोड़ा था।