कहने को सरकारी नौकरी है, मगर इसे पूरा करने के लिए इन कर्मियों को दारू पीनी पड़ती है, वो भी अपनी जेब से। अगर दारू नहीं पीते हैं तो नौकरी नहीं होती। देश में आज भी चतुर्थ श्रेणी के पोस्टमार्टम कर्मचारी व तकनीशियन शव की बदबू से बचने के लिए दारू पीते हैं।
दूसरे वे कर्मचारी हैं जो आज भी नंगे बदन सीवरेज लाइन में उतर जाते हैं। यहां बदबू से बचने के लिए उन्हें शराब की बोतल का सहारा लेना पड़ रहा है।कभी खुद की जेब से तो कभी जिनका सीवर ब्लाॅक रहता है, वे बोतल मुहैया करा देते हैं।देश में करीब तीस लाख सफाई कर्मी और पांच हजार से अधिक पोस्टमार्टम कर्मी ऐसे हैं, जो संसाधनों के अभाव में दारू पीकर अपनी ड्यूटी करते हैं।
कई राज्यों के पोस्टमार्टम कर्मियों ने किया बड़ा खुलासा
पोस्टमार्टम प्रक्रिया के दौरान बतौर सहायक काम करने वाले कर्मचारी बताते हैं कि देश के अधिकांश अस्पतालों में अभी तक संसाधनों का घोर अभाव है। कई जगहों पर पीएचसी में तो पोस्टमार्टम खुले में ही होता है। यूपी, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिसा, असम, मणिपुर, पश्चिम बंगाल और कई दूसरे राज्यों के ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों में पोस्टमार्टम को बहुत हल्के में लिया जाता है। यहां पर खुले में या फिर एक सामान्य कमरे में सीमेंट के स्टैंड पर चीरफाड़ होती है।
गिनती के जिला अस्पतालों को छोड़ दें तो बाकी जगहों पर पोस्टमार्टम प्रक्रिया के दौरान पानी भी बाल्टी से लाना पड़ता है। सड़क हादसे में मौत हुई है, जहर खाने का मामला है या फिर बाॅडी कई दिनों बाद नदी-नाले से बरामद हुई है तो उसमें से भयानक बदबू उठती है। उससे बचने के लिए ही वे कर्मचारी शराब पी लेते हैं। वजह, शव को स्टैंड पर रखने, खोलने, पलटने और जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे दोबारा से बंद करने की जिम्मेदारी उसी कर्मचारी पर होती है।
मामला गंभीर है तो ही डाॅक्टर अपने सामने बाॅडी की चीरफाड़ कराते हैं। सामान्य केस में तो डाॅक्टर कुछ मिनट के लिए शव को देखने आते हैं। इसके बाद शव को बंद कर उसे साफ करने की जिम्मेदारी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की ही होती है। इस कार्य में चार-पांच घंटे भी लग जाते हैं। कई दफा डाॅक्टर आने में देर हो जाती है, तब तक वह कर्मचारी ही शव को इधर-उधर रखता है।
लेडी हार्डिंग्स अस्पताल के फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉक्टर बीएल चैधरी बताते हैं कि पोस्टमार्टम रूम बहुत साफ सफाई वाला होना चाहिए। हालांकि हर जगह पर यह संभव नहीं हो पाता।पीएचसी लेवल पर अभी ऐसी सुविधाओं का अभाव है। कई बड़े अस्पतालों में मशीन द्वारा बदबू और इन्फेक्शन रोका जाता है। पोस्टमार्टम के लिए अलग से टेबल या स्टैंड होता है।वहां पानी से लेकर दूसरी कई तरह की सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं।
दारू पीना तो सीवरेज कर्मियों की मजबूरी है
स्वतंत्र मजदूर विकास संयुक्त मोर्चे के अध्यक्ष संजय गहलौत का कहना है कि जब हमारे सफाई कर्मचारियों के पास संसाधन ही नहीं है तो फिर दारू पीकर सीवरेज लाइन में उतरना उनकी मजबूरी है। हर कोई सीवर की गंदगी से वाकिफ है। अगर इससे बचने के लिए सीवर कर्मियों के पास कोई दूसरा तरीका होता तो उन्हें दारू क्यों पीनी पड़ती।
सरकार या कोई आयोग भले ही यह दावा करे कि सीवर में उतरने वाले कर्मियों को तमाम सुरक्षा उपकरण मुहैया कराए गए हैं तो यह सरासर झूठ है। दिखावे के लिए कुछ पाॅश इलाकों में कर्मियों को पाॅलीथीन दे देते हैं। कर्मचारी इसे अपने बदन पर लपेट कर सीवर में उतर जाते हैं। दिल्ली सरकार की इन्हीं वादा खिलाफी के चलते करीब 80 हजार कर्मचारी 12 सितंबर को हड़ताल पर जा रहे हैं। हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद कर्मियों को उनका बकाया एवं अन्य सुविधाएं नहीं दी जा रही।
ये सब तो सफाई कर्मियों का हक बनता है, मगर कौन देता है
एमसीडी स्वच्छता कर्मचारी यूनियन के नेता जोगेंद्र बोहत का आरोप है कि सरकार जानबूझ कर सफाई कर्मियों की उपेक्षा करती है।ये कर्मचारी सबसे ज्यादा जोखिम वाला काम करते हैं, लेकिन फिर भी उनकी ओर कोई नहीं देखता।
नियम है कि सीवरेज में उतरने से पहले कर्मियों को गम्बूट (प्लास्टिक के जूते, जो घुटने तक आते हैं), मास्क, दस्ताना, फावड़ा, वर्दी और तेल साबून मिले, लेकिन यह सब बातें केवल नाम की हैं।हकीकत अगर आप देखना चाहें तो किेसी भी कॉलोनी में जाकर कर्मियों की दयनीय हालत देख सकते हैं।आॅक्सीजन सिलेंडर व सेफ्टी बेल्ट जैसी बातें केवल फाइल में ही हैं।
भले ही दिल्ली सरकार मशीनों से सीवर साफ़ कराने का दावा कर रही है, लेकिन बरसात के मौसम या दूसरे दिनों में कर्मचारी आज भी खुद ही नंगे बदन सीवर में उतरते हैं।यह सही है कि कुछ दुकानदार या मोहल्ले वाले, जिनका सीवर बंद होता है तो वे इन कर्मियों को शराब की एक बोतल मुहैया करा देते हैं।
मगर यह हर जगह पर सही नहीं है, कर्मियों को बदबू से बचने के लिए खुद अपने पैसे से दारू खरीद कर पीनी पड़ती है।पिछले साल सरकारी आंकडों में भले ही करीब सौ कर्मचारियों की सीवरेज गैस से मौत दिखाई गई है, लेकिन सच्चाई कुछ अलग है।कर्मचारी नेता का दावा है कि देश में ऐसे हजारों मामले हैं जो दर्ज ही नहीं होते।
अब देखिये राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग क्या कहता है
आयोग के सचिव नारायण दास का कहना है कि सभी राज्यों को ये आदेश जारी किए गए हैं कि कोई सफ़ाई कर्मचारी सीवरेज में बिना सुरक्षा उपकरणों के नहीं उतरेगा। अगर उन्हें कोई ऐसा करने के लिए मजबूर करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में पुलिस केस दर्ज करने का प्रावधान है।