इस वक्त दुनियाभर में ऊर्जा का महत्व काफी बढ़ गया है। ऊर्जा की कमी से जूझ रहे देश भी अब सभी गैर परंपरागत ऊर्जा के स्त्रोत पर अपनी निर्भरता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इस दिशा में भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। पवन ऊर्जा उत्पन्न करने के मामले में भारत चौथे नंबर पर पहुंच गया है। भारत के बाद क्रमश: स्पेन, इंग्लैंड और फ्रांस का नाम आता है। वहीं दुनियाभर में इस मामले में पहले स्थान पर चीन, दूसरे पर अमेरिका और तीसरे पर जर्मनी है।
अब दुनिया के 70 से अधिक देशों में पवन ऊर्जा का इस्तेमाल हो रहा है। ये बात विश्व पवन ऊर्जा के आंकड़ों में कही गई है। बीते करीब बीस सालों से एशिया में इस क्षेत्र में सबसे अधिक निवेश हुआ है। दुनियाभर के पवन टर्बाइनों में से 40 फीसदी एशिया में ही हैं।
अगर एशिया की बात करें तो पवन ऊर्जा उत्पन्न करने के मामले में चीन भारत से आगे है। भारत में पवन ऊर्जा के विकास का काम 1990 के दशक में शुरू हुआ था। इसमें लगतारा वृद्धि हो रही है। अगर 2018 के आंकड़े देखें तो भारत में साल 2018 में पवन ऊर्जा की क्षमता 34,043 मेगावाट है। ये मुख्य रूप से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश आदि राज्यों में फैली हुई है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि पवन ऊर्जा तैयार करने की लागत 2.43 रुपये प्रति किलोवाट हो गई है।
भारत सरकार ने इस ओर प्रगति करते हुए साल 2022 तक 175 गीगावॉट की अक्षय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस उद्देश्य के तहत सौर ऊर्जा से 100 गीगावॉट, पवन ऊर्जा से 60 गीगावॉट, जैव-ऊर्जा से 10 गीगावॉट एवं छोटी जल-विद्युत परियोजनाओं के जरिए पांच गीगावॉट के ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।