फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Global Wind Day 2019: पवन ऊर्जा के उत्पादन में चौथे स्थान पर भारत, ऐसे हो रही इस क्षेत्र में प्रगति

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: शिल्पा ठाकुर Updated Sat, 15 Jun 2019 12:23 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : mnre.gov.in/wind

इस वक्त दुनियाभर में ऊर्जा का महत्व काफी बढ़ गया है। ऊर्जा की कमी से जूझ रहे देश भी अब सभी गैर परंपरागत ऊर्जा के स्त्रोत पर अपनी निर्भरता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इस दिशा में भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। पवन ऊर्जा उत्पन्न करने के मामले में भारत चौथे नंबर पर पहुंच गया है। भारत के बाद क्रमश: स्पेन, इंग्लैंड और फ्रांस का नाम आता है। वहीं दुनियाभर में इस मामले में पहले स्थान पर चीन, दूसरे पर अमेरिका और तीसरे पर जर्मनी है। 

70 से अधिक देशों में इस्तेमाल 

अब दुनिया के 70 से अधिक देशों में पवन ऊर्जा का इस्तेमाल हो रहा है। ये बात विश्व पवन ऊर्जा के आंकड़ों में कही गई है। बीते करीब बीस सालों से एशिया में इस क्षेत्र में सबसे अधिक निवेश हुआ है। दुनियाभर के पवन टर्बाइनों में से 40 फीसदी एशिया में ही हैं।

एशिया में कौन सा देश है आगे

अगर एशिया की बात करें तो पवन ऊर्जा उत्पन्न करने के मामले में चीन भारत से आगे है। भारत में पवन ऊर्जा के विकास का काम 1990 के दशक में शुरू हुआ था। इसमें लगतारा वृद्धि हो रही है। अगर 2018 के आंकड़े देखें तो भारत में साल 2018 में पवन ऊर्जा की क्षमता 34,043 मेगावाट है। ये मुख्य रूप से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश आदि राज्यों में फैली हुई है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि पवन ऊर्जा तैयार करने की लागत 2.43 रुपये प्रति किलोवाट हो गई है। 
 

क्या है 2022 तक लक्ष्य?

भारत सरकार ने इस ओर प्रगति करते हुए साल 2022 तक 175 गीगावॉट की अक्षय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस उद्देश्य के तहत सौर ऊर्जा से 100 गीगावॉट, पवन ऊर्जा से 60 गीगावॉट, जैव-ऊर्जा से 10 गीगावॉट एवं छोटी जल-विद्युत परियोजनाओं के जरिए पांच गीगावॉट के ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

विज्ञापन

प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : mnre.gov.in/wind
इस वक्त दुनियाभर में ऊर्जा का महत्व काफी बढ़ गया है। ऊर्जा की कमी से जूझ रहे देश भी अब सभी गैर परंपरागत ऊर्जा के स्त्रोत पर अपनी निर्भरता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इस दिशा में भारत भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। पवन ऊर्जा उत्पन्न करने के मामले में भारत चौथे नंबर पर पहुंच गया है। भारत के बाद क्रमश: स्पेन, इंग्लैंड और फ्रांस का नाम आता है। वहीं दुनियाभर में इस मामले में पहले स्थान पर चीन, दूसरे पर अमेरिका और तीसरे पर जर्मनी है। 

70 से अधिक देशों में इस्तेमाल 

अब दुनिया के 70 से अधिक देशों में पवन ऊर्जा का इस्तेमाल हो रहा है। ये बात विश्व पवन ऊर्जा के आंकड़ों में कही गई है। बीते करीब बीस सालों से एशिया में इस क्षेत्र में सबसे अधिक निवेश हुआ है। दुनियाभर के पवन टर्बाइनों में से 40 फीसदी एशिया में ही हैं।

एशिया में कौन सा देश है आगे

अगर एशिया की बात करें तो पवन ऊर्जा उत्पन्न करने के मामले में चीन भारत से आगे है। भारत में पवन ऊर्जा के विकास का काम 1990 के दशक में शुरू हुआ था। इसमें लगतारा वृद्धि हो रही है। अगर 2018 के आंकड़े देखें तो भारत में साल 2018 में पवन ऊर्जा की क्षमता 34,043 मेगावाट है। ये मुख्य रूप से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश आदि राज्यों में फैली हुई है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि पवन ऊर्जा तैयार करने की लागत 2.43 रुपये प्रति किलोवाट हो गई है। 
 

क्या है 2022 तक लक्ष्य?

भारत सरकार ने इस ओर प्रगति करते हुए साल 2022 तक 175 गीगावॉट की अक्षय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस उद्देश्य के तहत सौर ऊर्जा से 100 गीगावॉट, पवन ऊर्जा से 60 गीगावॉट, जैव-ऊर्जा से 10 गीगावॉट एवं छोटी जल-विद्युत परियोजनाओं के जरिए पांच गीगावॉट के ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

कहां आ सकती है परेशानी?

फिच सॉल्यूशन्स मैक्रो रिसर्च की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत 2022 तक 60 के बजाय 54.7 गीगावॉट की पवन ऊर्जा क्षमता ही हासिल कर पाएगा। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दे और ग्रिड से संबंधित अड़चनों की वजह से इस क्षेत्र में परियोजनाओं को लागू करने में देरी होगी।

भारत में पवन ऊर्जा में 2016 में 54,642 मेगावाट, 2015 में 63,330 मेगावाट, 2014 में 51,675 मेगावाट और 2013 में 36,023 मेगावाट की वृद्धि हुई है। 

जलवायु परिवर्तन बन रही बड़ी समस्या

भारत में पवन ऊर्जा पर जलवायु परिवर्तन का काफी प्रभाव पड़ रहा है। हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि हिंद महासागर से चलने वाले मानसून में फर्क आया है, जिसके कारण भारत में पवन ऊर्जा की क्षमता में गिरावट आ रही है। माना जा रहा है कि बीते चार दशक में 13 फीसदी की गिरावट आई है।

नहीं मिल रहा अधिक लाभ

एसईएएएस और हार्वर्ड चीन प्रोजेक्ट में पोस्टडॉक्टरल फेलो मेंगगाओ ने बताया कि भारत ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारी निवेश किया हुआ है। लेकिन इससे होने वाला लाभ जलवायु परिवर्तन की चपेट में आ रहा है। जहां सबसे अधिक निवेश किया गया है, वहीं पर पवन ऊर्जा में सबसे अधिक गिरावट देखी जा रही है, जैसे महाराष्ट्र और राजस्थान में। जबकि अन्य क्षेत्र में कोई खास अंतर नहीं देखा गया है।  

प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : File Photo

रोजगार के अवसर 

क्लीन एनर्जी पर जो भारत द्वारा योजना तैयार की गई है उससे आने वाले 10 सालों में देश में तकरीबन 12 लाख नौकरियों के अवसर पैदा होंगे। ये बात काउंसिल ऑफ एनर्जी, एन्वायरर्मेंट एंट वाटर (सीईईई) के एक अध्ययन में कही गई है। वहीं विंड पावर से सात साल में करीब दो लाख नौकरियों के आने की उम्मीद है।

कैसे होता है उत्पादन?

दुनियाभर में पवन ऊर्जा का इस्तेमाल विद्युत उत्पादन के लिए होने लगा है। बहती हुई हवा टर्बाइन की पंखुड़ियों को घुमाती है और जेनरेटर में विद्युत पैदा होता है। इसमें सबसे पहले एक से दो सालों तक स्थापना हेतु उपयुक्त स्थल के चयन के लिए क्षेत्र विशेष में हवा की गति के आंकड़े एकत्र किए जाते हैं। ये काम पवन-ऊर्जा जनरेटरों की स्थापना के लिए होता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next