सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम में शादी के लिए ‘वैध सहमति’ की शर्त डालने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने बुधवार को कहा कि अधिनियम के प्रावधानों में पहले ही ‘सहमति’ अंतर्निहित है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही अधिनियम में शादी के लिए वैध सहमति की शर्त डालने पर विचार करने की कर्नाटक की 26 वर्षीया महिला की अपील ठुकरा दी।
महिला में अपनी याचिका में कहा है कि वह कर्नाटक के राजनीतिक परिवार से आती है। 14 मार्च को उसकी जबरन शादी करा दी गई थी। वह 5 अप्रैल को परिवारवालों के चंगुल से निकल भागी और अब दिल्ली महिला आयोग की शरण में है। बंगलूरू से एमटेक कर रही इस महिला ने आरोप लगाया कि उसके सगे भाई ने बलात्कार, एसिड अटैक और हत्या की धमकी दी है। इस पर शीर्ष अदालत ने केंद्र से उसे सुरक्षा मुहैया कराने को कहा। महिला ने याचिका में कहा कि कर्नाटक पुलिस ने उसकी मदद नहीं की। उसका कहना है कि वह अपनी जाति से बाहर शादी करना चाहती थी। साथ ही उसे ऑनर किलिंग का भी डर था।
महिला की वकील इंदिरा जयसिंह ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(2) और 7 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कहा कि यह मौलिक अधिकारों के विपरीत है। उन्होंने दलील दी कि कानून के तहत शादी के प्रावधानों में लड़की की सहमति का कोई प्रावधान नहीं है। इंदिरा जयसिंह ने कहा कि शादी लड़की की सहमति के बिना हुई है। इस मसले को लेकर प्रावधानों में स्पष्टता नहीं है।
इस पर पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम में स्पष्ट कहा गया है कि यदि महिला की स्वैच्छिक सहमति के बगैर जबरन या धोखे से शादी कराई जाती है तो वह शादी अवैध होगी। अगर लड़की अपने ससुराल में नहीं जाना चाहती है तो यह उसकी मर्जी है। शादी निरस्त कराने के लिए वह फैमिली कोर्ट जा सकती है। तब तक हम महिला को संरक्षण देंगे।