भारतीय सेना का टैंक (फाइल फोटो)
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अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में चीन और भारत के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद भारत सीमा पर अपनी तैयारियों को तेज कर रहा है। इस क्रम में भारतीय सेना चीन से लगी सीमाओं पर तैनाती के लिए हल्के टैंकों को विकसित कर रही है। इन्हें जोरावर नाम दिया गया है। इसे लेकर अप एक नया अपडेट सामने आया है। बताया जा रहा है कि पूरे जोरावर लाइट टैंक प्रोजेक्ट के लिए अमेरिकी कमिंस इंजन का उपयोग जारी रखा जाएगा। डीआरडीओ के सूत्रों ने बताया कि जर्मन इंजनों की आपूर्ति में समस्याओं के कारण इस परियोजना में पहले ही कई महीनों की देरी हो चुकी है।
गौरतलब है कि जोरावर लाइट टैंक के निर्माण के लिए जर्मनी की तरफ से इंजन की आपूर्ति को लेकर मंजूरी भी मिल गई है। बावजूद इसके डीआरडीओ ने फैसला किया है कि वो जोरावर कार्यक्रम के लिए केवल कमिंस इंजन का ही प्रयोग करेगा।
बता दें कि जोरावर लाइट टैंक परियोजना को पहले जर्मन इंजन के साथ विकसित करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि समय पर जर्मन निर्यात नियंत्रण मंजूरी नहीं मिल सकी जिसके कारण इसमें देरी हुई। इसके बाद इसे अमेरिकी इंजन के साथ विकसित करने का निर्णय लिया गया। जोरावर लाइट टैंक को DRDO और निजी क्षेत्र की कंपनी लार्सन एंड टुब्रो का मिलकर बना रही है।
बता दें कि अमेरिकी कमिंस इंजन से लैस लाइट टैंक प्रोटोटाइप लगभग तैयार है। इस साल के अंत तक इसका परीक्षण शुरू हो जाएगा। शुरुआती परीक्षणों के बाद इसका मुख्य परीक्षण रेगिस्तानी क्षेत्रों से लेकर लद्दाख और सिक्किम सेक्टर के ऊंचाई वाले इलाकों में किया जाएगा। इस टैंक को सभी इलाकों में इस्तेमाल करने की योजना है। इस उद्देश्य के लिए सभी परिस्थितियों में इसका परीक्षण किया जाएगा।
टैंक का नाम महान पूर्व डोगरा सेना के जनरल जोरावर सिंह के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने तिब्बत में कई सफल जीत का नेतृत्व किया था, जिसे अब चीनी सेना द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सूत्रों ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र, सीमांत इलाके और द्वीप क्षेत्रों के अलावा मैदानी, अर्ध-रेगिस्तान और रेगिस्तान में किसी भी संकट के मद्देनजर मध्यम युद्धक टैंकों की जरूरतों के देखते हुए अब इसे सेना में शामिल करना महत्वपूर्ण हो गया है।