एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने बुधवार को कहा कि पत्रकार गौरी लंकेश की बेंगलूर में उनके घर के बाहर गोली मारकर की गई हत्या के एक साल बाद भी कई पत्रकारों को जान से मारने की धमकियों, हमलों और फर्जी आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। एमनेस्टी ने इस बात पर जोर दिया कि यह भारत में अधिकारियों को सच कहने के लिहाज से ‘‘खतरनाक’’ समय है।
मानवाधिकार संगठन ने कहा कि पत्रकारिता पर हमले से न केवल भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार गला घोंटा जाता है बल्कि लोगों को ‘‘चुप कराने पर भी इसका काफी प्रभाव पड़ता है।’’
एमनेस्टी ने नक्सलियों से संबंध के आरोप में नजरबंद किए गए पत्रकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और वामपंथी कवि वरवर राव का उदाहरण देते हुए बताया कि यह अभिव्यक्ति की आजादी का दमन है।
गौरी लंकेश की पिछले साल पांच सितंबर को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में गिरफ्तार किए गए कुछ लोगों के तार हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े बताए जा रहे हैं।
एमनेस्टी इंडिया के आकार पटेल ने कहा, ‘‘यह ठीक है कि गौरी लंकेश हत्याकांड की जांच में प्रगति होती लग रही है, लेकिन कई अन्य पत्रकारों एवं घोटालों का खुलासा करने वालों पर हुए हमलों की जांच में शायद ही कुछ हुआ है। यह भारत में सत्ता को सच कहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए खतरनाक समय है।’’
‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के मुताबिक, 2018 के पहले छह महीने में भारत में कम से कम चार पत्रकार मारे गए हैं और कम से कम तीन अन्य पर हमला हुआ है। एमनेस्टी ने कहा कि सरकार की आलोचना वाली पत्रकारिता करने वाले कई अन्य पत्रकारों को भी धमकियां मिली हैं।