महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) में गणेश उत्सव की भूमिका आजादी की लड़ाई में बेहद अहम रही थी। गणेश उत्सव ने निजाम काल और ब्रिटिश शासन के दौरान जन जागरुकता फैलाने का काम भी किया। यह जानकारी साल 1973 में प्रकाशित हुई स्थानीय निकाय के संस्मरण में दी गई। स्थानीय इतिहास शोधकर्ताओं का कहना है कि निजाम काल में गणेश उत्सव मनाने पर काफी प्रतिबंध थे। इसके बावजूद लोग स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में जागरुकता फैलाने का कोई न कोई तरीका ढूंढ ही लेते थे।
1904 से संभाजी नगर में हुई गणेश उत्सव मनाने की शुरुआत
संस्मरण के मुताबिक भगवान गणेश को समर्पित यह उत्सव 17 सितंबर, 1948 को निजाम शासन से तत्कालीन हैदराबाद राज्य (जिसमें वर्तमान महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के क्षेत्र शामिल थे) के आजाद होने तक यहां सीमित क्षेत्रों में मनाया जाता था। छत्रपति संभाजीनगर में गणेशोत्सव 1904 से सार्वजनिक रूप से मनाया जा रहा है। लेकिन 1925 में गणेश महासंघ (त्योहार मनाने के लिए संगठन) के गठन ने यहां उत्सव को एक संगठित रूप दिया। कई बार गणेश मंडलों द्वारा विभिन्न मुद्दों पर जन जागरूकता बढ़ाने के लिए जो विषय उठाए गए, उन पर भी खासा विवाद देखने को मिला था। इस मेमोयर को एक प्रति स्थानीय इतिहासकार और छत्रपति शिवाजी संग्रहालय के निदेशक श्रीप्रकाश पुरवार द्वारा डिजिटल की गई है।
गणेश उत्सव की थीम पर हुए विवाद
संस्मरण के मुताबिक गणेश पंडाल में शिवाजी महाराज द्वारा हिंद माता को गुलामी से मुक्त करने जैसे विषय दर्शाए गए, जबकि एक बार भगवान गणेश को एक शेर को मारते हुए दिखाया गया था, जिसे ब्रिटिश सरकार के रूप में दिखाया गया था। साल 1945-46 में आजादी की राह पर नामक एक थीम में महात्मा गांधी को मोहम्मद अली जिन्ना के कंधों पर हाथ रखते हुए और स्वराज्य के मंदिर में जाते हुए दिखाया गया था। इसे लेकर विवाद हो गया था और कई लोगों का आरोप था कि इससे मुस्लिम समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं। इसे लेकर पथराव भी हुआ था। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद हालात नियंत्रण में आए थे।
निजाम काल में लागू थीं कई पाबंदियां
इतिहासकारों के मुताबिक निजाम काल में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ़ बोलना मुश्किल था। उस दौरान किसी भी विवादास्पद टिप्पणी के लिए कानूनी परिणाम भुगतने पड़ते थे। हालांकि निज़ाम शासन 17 सितंबर, 1948 को समाप्त हो गया, लेकिन हैदराबाद राज्य 1956 तक अस्तित्व में रहा जब इसे भाषाई रूप से पुनर्गठित किया गया। गणेश महासंघ के पूर्व अध्यक्ष मनोहर गवली ने अपने एक लेख में, जो संस्मरण का हिस्सा है, कहा कि निजाम के दौर में गणेश उत्सव मनाना मुश्किल था। निजाम की तानाशाही ने लोगों को उनके त्योहार मनाने नहीं दिए।
ऐसे में महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य तिलक ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लोगों को संगठित करने के लिए 1890 के दशक में बड़े पैमाने पर सामुदायिक गणेश उत्सव की शुरुआत की थी। उस समय धार्मिक गतिविधियों के अलावा लोकतंत्र, आजादी की लड़ाई के गीत गणेश उत्सव का मुख्य आकर्षण और लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने का एक माध्यम थे।