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Freedom Struggle: आजादी की लड़ाई में विदेशियों का योगदान, जानें भारत का साथ देने वाले ऐसे लोगों को

Mon, 15 Aug 2022 07:37 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अमर उजाला आपको उन विदेशियों के बारे में बता रहा है, जिन्होंने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज शुरू होने से लेकर मंगल पांडे को मौत की सजा सुनाए जाने और आखिर में भारत की स्वतंत्रता की जंग के दौरान भी भारत का समर्थन किया।
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स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने वाले विदेशी। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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भारत को स्वतंत्रता मिले आज 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। देश के स्वतंत्रता संग्राम में ऐसे कई नामों का जिक्र हुआ है जिन्हें आजादी की लड़ाई में पहचान मिली। फिर चाहे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम हो या सबसे कम उम्र में जान गंवाने वाले स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस का। हालांकि, अधिकतर लोग उन विदेशियों के बारे में नहीं जानते, जिन्होंने ब्रिटिश शासन में रहने के बावजूद भारत की स्वतंत्रता की वकालत की। सिर्फ जुबानी तौर पर नहीं, बल्कि अपनी कलम से भी। 
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अमर उजाला आपको उन विदेशियों के बारे में बता रहा है, जिन्होंने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज शुरू होने से लेकर मंगल पांडे को मौत की सजा सुनाए जाने और आखिर में भारत की स्वतंत्रता की जंग के दौरान भी भारत का समर्थन किया। ऐसे बड़े नामों में आयरलैंड की समाजसेवी एनी बेसेंट से लेकर सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रोफेसर सीएफ एंड्रूज और कांग्रेस के संस्थापकों में से एक एओ ह्यूम तक शामिल हैं। हालांकि, इन नामों की भारत में खास चर्चा नहीं होती। आइये इनके बारे में जानते हैं...

1. एनी बेसेंट
लंदन में एक उच्च मध्यमवर्ग परिवार में जन्मीं एनी बेसेंट 1917 में कोलकाता में कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष चुनी गईं। वह मूल रूप से आयरलैंड की रहने वाली थीं, लेकिन उन विदेशियों में शामिल थीं, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई। महिला अधिकार कार्यकर्ता एनी बेसेंट का जन्म एक अक्तूबर सन 1847 में हुआ था। उनके पिता डाक्टर थे। 

बेसेंट 16 नवंबर 1893 को मद्रास के अडयार में थियोसोफिकल सोसायटी के वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेने पहली बार भारत आईं और फिर यहीं कि हो कर रह गई। उन्होंने साल 1898 में वाराणसी में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की। पहले विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1914 में एनी ने साप्ताहिक समाचार पत्र ‘कॉमनविल’ की स्थापना की। 

इसी वर्ष उन्होंने 'मद्रास स्टैंडर्ड' को खरीद कर उसे 'न्यू इंडिया' नाम दिया। बेसेंट साल 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। भारत में फैली सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह, जाति व्यवस्था, विधवा विवाह आदि को दूर करने के लिए बेसेंट ने 'ब्रदर्स ऑफ सर्विस' संस्था बनाई।

2. एओ ह्यूम
देश की आजादी में सबसे अहम भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी का संस्थापक कोई भारतीय या पाकिस्तानी चेहरा नहीं, बल्कि एक अंग्रेज था। इनका नाम था एलन आक्टेवियन ह्यूम। इंग्लैंड में जन्मे ह्यूम अंग्रेजी अफसर थे। भारत में 1849 में उन्हें नौकरशाह के तौर पर तैनात किया गया था। हालांकि, अंग्रेजी सरकार की कई गलत नीतियों का विरोध करने के बाद 1879 में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। एनी बेसेंट की तरह ही एओ ह्यूम भी थियोसॉफिकल सोसाइटी से जुड़ गए। 

1885 में ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की। माना जाता है कि ह्यूम ने कांग्रेस को खड़ा इसलिए किया ताकि भारत के पढ़े-लिखे लोगों की आवाज और अधिकारों की लड़ाई को अंग्रेजों के कानों तक पहुंचाया जा सके।  

3. जॉर्ज यूल
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के तीसरे साल यानी 1888 में हुए इलाहाबाद अधिवेशन में जार्ज यूल को अध्यक्ष बनाया गया। यूल का जन्म 1829 में स्कॉटलैंड में हुआ था। वे कलकत्ता के प्रमुख व्यवसायी थे। कांग्रेस के पहले अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी के न्योते के बाद यूल ने यह पद संभाला और पार्टी के इलाहाबाद अधिवेशन की अध्यक्षता की। जॉर्ज यूल भारतीय समाज के बीच अपने विशाल दृष्टिकोण, उदारवादी विचार और भारतीय महत्वाकांक्षाओं के प्रति सम्मान के लिए जाने जाते थे। 
 
बताया जाता है कि जिस योग्यता से उन्होंने इलाहाबाद अधिवेशन का संचालन किया। इसके चलते वह भारतीय समाज में एक शक्तिशाली और मशहूर व्यक्ति बन गए और इसी वजह से भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला।  
 
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4. सीएफ एंड्रूज 
ब्रिटिश शिक्षाविद् और समाज सुधारक चार्ल्स फ्रीयर एंड्रूज महात्मा गांधी के बेहद करीबी थे। बताया जाता है कि महात्मा गांधी जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम से दूर दक्षिण अफ्रीका में थे। तब उन्हें भारत लौटने के लिए प्रेरित करने में सबसे अहम भूमिका सीएम एंड्रूज ने निभाई। एंड्रूज का जन्म फरवरी 1871 को इंग्लैंड में हुआ था। वे भारत आने के बाद यहां की संस्कृति में ही रच-बस गए। यहां उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस में पढ़ाया। इसी दौरान वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभा रहे गोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे बड़े नेताओं के संपर्क में आए।
 
एंड्रूज ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को न सिर्फ समर्थन दिया, बल्कि ब्रिटिश नीतियों का भी जमकर विरोध किया। उन्होंने जलियांवाला बाग कांड के लिए ब्रिटिश सरकार को दोषी ठहराते हुए जरनल ओ डायर के कुकृत्य को "जानबूझ कर किया गया जघन्य हत्याकांड" बताया।
एंड्रूज ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय नेताओं के द्वारा चलाए गए कई आंदोलनों में हिस्सा लिया। 1918 में मद्रास में सूती उद्योग बुनकरों द्वारा की गई हड़ताल हो या 1919 में चांदपुर में चाय बागान के बेरोजगार मजदूरों के लिए राहत कार्य। इसके अलावा राजस्थान और शिमला के मजदूरों के साथ-साथ 1921-22 में टूंडला के रेलवे कर्मचारियों का हड़ताल में भी एंड्रूज ने बढ़चढ़कर विरोध प्रदर्शन किए।
 
1925 और 1927 में एंड्रूज ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष भी चुने गये। उन्होंने भारत के समाज सुधारक डॉ बीआर अंबेडकर के साथ 1933 में हरिजनों के मांगों का समर्थन किया एवं अछूतों के उद्धार के लिए चल रहे आंदोलन में उनके सक्रिय योगदान दिया। गरीबों और असहायों के प्रति उनकी संवेदना के कारण एंड्रूज को सेंट स्टीफंस में दीनबंधु के संबोधन से अलंकृत किया गया। उन्होंने शांतिनिकेतन में 'हिंदी भवन' की स्थापना की।
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