दूरसंचार उन चुनिंदा क्षेत्रों में है, जिनमें भारत ने अपने बूते जबरदस्त प्रगति की है। लैंडलाइन से निकलकर इंटरनेट के दौर में 2जी, 3जी, फिर 4जी के मामले में हमने विकसित देशों के साथ कदमताल किया। अब इस साल जल्द 5जी सेवाएं शुरू होंगी। शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन से लेकर दफ्तर के कई कामकाज पलक झपकते ही ऑनलाइन हो जाएंगे। लेकिन कॉल ड्रॉप, खराब वॉइस या वीडियो कॉल इस क्षेत्र में उपभोक्ताओं की बड़ी समस्या बनी हुई है। देशभर में टेलीकॉम टावरों की पहुंच के बावजूद लोग मोबाइल फोन पर नॉट रीचेबल रहते हैं। इसके चलते कंपनियों और सरकार की काफी किरकिरी होती है जबकि वे ग्राहकों से पहले के मुकाबले 25% ज्यादा राशि वसूल रही हैं। लाखों-करोड़ों लोग पोर्टेबिलिटी की ओर भागते हैं पर समाधान नहीं मिलता। लोगों को उम्मीद है कि कम से कम 5जी में तो इससे छुटकारा मिलेगा।
विश्व स्तर के संस्थान तो गढ़े, नोबेल भी हो हमारा आजादी मिली तो भारत में महज 12 फीसदी लोग साक्षर थे। आज 74 फीसदी आबादी पढ़ी-लिखी है। भारत का शिक्षा तंत्र दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है। एम्स, आईआईटी, आईआईएम और आईआईएससी की गिनती दुनिया के बेहतरीन उच्च शिक्षण संस्थानों में होती है। लेकिन 1947 से विज्ञान और चिकित्सा क्षेत्र में हमें आज तक एक भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया। इसकी बड़ी वजह 75 वर्षों में हमारे प्राथमिक से लेकर कॉलेज स्तरीय शिक्षा ढांचे का बदलती जरूरतों के साथ कदमताल न कर पाना रहा।
शिक्षा और अनुसंधान में आज भी हमारा खर्च जीडीपी का महज 0.7 फीसदी यानी दुनिया में सबसे कम है। यही वजह है, इतनी बड़ी आबादी और प्रतिभा वाला देश होने के बावजूद भारत पश्चिम के मुकाबले शोध व वैज्ञानिक अनुसंधान में पीछे रहा है। आजादी के पहले एकमात्र भारतीय सीवी रमन के बाद कोई भी विज्ञान का नोबेल नहीं पा सका। पश्चिम की तर्ज पर हमें कोरी सैद्धांतिक पढ़ाई के इतर प्रयोगात्मक व खोजपूर्ण शिक्षा पर जोर देने की सख्त जरूरत है। ताकि भविष्य में बच्चे-युवा विज्ञान की दुनिया में झंडे गाड़ सकें। इस दिशा में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिये शुरुआत हुई है, जिसमें डिजिटलीकरण व शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर दिया गया है।
दुनिया की फार्मा कैपिटल, पर एपीआई बाहर से मंगाते हैं
एक जमाने में इलाज के अभाव में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विश्वस्तरीय चिकित्सा ढांचे व सुविधा के कारण भारत ने पहचान बनाई है। हालांकि, कोरोनाकाल में दवा, बेड, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन जैसी जान बचाने वाली बुनियादी जरूरतों के अभाव ने हम पर सवाल जरूर खड़ा कर दिया। भारत दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है पर दवा बनाने के लिए 70 फीसदी एपीआई आज भी चीन जैसे देशों से आयात होता है। कोरोनाकाल में इस विदेशी निर्भरता के कारण हमें दवाओं के लिए संघर्ष करना पड़ा। लिहाजा, भविष्य में स्वास्थ्य में आत्मनिर्भरता के लिए हमें घरेलू निर्माण पर जोर देना होगा। ताकि संकट के समय हम अपनी जरूरतें आसानी से पूरी कर सकें।
भारत गांवों का देश है और खेती हमेशा से इसकी धुरी रही। 75 साल पहले गुलामी से मुक्ति तो मिल गई थी, पर अनाज की किल्लत और भुखमरी की भारी आशंकाएं थीं, जो 60 के दशक में डराने लगी थीं। लेकिन भारत ने इन्हें गलत साबित करते हुए हरित क्रांति को अंजाम देकर कृषि उत्पादन छह गुना तक बढ़ाया। एक दशक पहले हम अनाज में आत्मनिर्भर बने और अब दुनिया के दस बड़े कृषि निर्यातकों में शुमार हैं। वैश्विक स्तर के औद्योगिकीकरण के बाद भी खेती हमारी जीडीपी में 20 फीसदी योगदान देती है। लेकिन उत्पादन बढ़ने के बावजूद 23 फीसदी किसान गरीबी रेखा के नीचे ही रह गए। छोटे और मंझाेले किसानों का ज्यादा लागत और कम मुनाफे के चलते खेती से ही मोहभंग होने लगा। पिछली जनगणना के मुताबिक, हर दिन दो हजार किसान खेती से मुंह मोड़ रहे थे और ग्रामीणों का शहरों की आेर पलायन बढ़ा। इसके मद्देनजर मौजूदा सरकार ने 75वें
स्वतंत्रता दिवस तक किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य रखा था। हालांकि, महामारी जैसी बाधा के कारण पूरा नहीं हो सका।
सरकारी सर्वे के मुताबिक, एक किसान परिवार की सभी स्रोतों से मासिक आय सिर्फ 10,218 रुपये है, जिसमें भी फसल उत्पादन का हिस्सा कम है। जानकारों के मुताबिक, खेती को मजबूत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और किफायती तकनीक आधारित बनाकर आकर्षित बनाया जा सकता है। अगर किसानों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा तो खेती से जुड़े उत्पाद और ऑटो क्षेत्र में मांग बढ़ेगी, जो पांच हजार अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को मजबूत संबल देगी।
औसत आयु 70 साल...पर जीवन शैली के रोगों ने बिगाड़ी चाल..
आजादी मिलते ही स्वास्थ्य उन क्षेत्रों में था, जिसे भारत में सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। लोगों तक दवाएं और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने व उनकी उपलब्धता पर खासा जोर रहा। नतीजतन, मृत्यु दर में कमी आने लगी। देश ने मलेरिया, टीबी, हैजा और एड्स जैसी गंभीर बीमारियों पर काबू पाया तो पोलियो से लंबी लड़ाई लड़कर उससे मुक्ति पाई। आज भारतीयों की औसत उम्र 70 साल से ज्यादा है, जो वैश्विक औसत के आसपास है। हालांकि, आधुनिक दौर में जीवनशैली से जुड़े रोगों ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
आलम यह है कि भारत आज विश्व की डायबिटीज कैपिटल कहा जाने लगा है और 2025 तक सात करोड़ से ज्यादा लोगों के इससे ग्रस्त होने के आसार हैं। आज भी अच्छा इलाज आम आदमी की पहुंच से बाहर बड़े देशों के मुकाबले स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च भी कम सिर्फ हृदय रोग और डायबिटीज के चलते दशक के अंत तक भारत को 6.2 खरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, देश में अच्छा इलाज आज भी आम आदमी की पहुंच से बाहर है। अभी 70 फीसदी ओपीडी सेवाएं, 58 फीसदी भर्ती मरीज और 90 फीसदी दवा व जांचें निजी हाथों में हैं। इसके अलावा बड़ी चुनौती यह भी है कि बड़े और विकसित देशों के मुकाबले भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च भी कम है। भारत इस पर जीडीपी का दो फीसदी खर्चता है जबकि वैश्विक औसत दस फीसदी है। शहर और ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे में कौशल व सेवाओं का बहुत अंतर है। इलाज तक संपन्न और कमजोर लोगों की पहुंच में बड़ा अंतर है। लिहाजा, सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य ढांचे को उन्नत बनाकर किफायती सेवाएं देने की सख्त जरूरत है।