इसकी रेंज करीब 2200 किलोमीटर है। इसके अलावा यह 490 नॉटिकल माइल्स या 789 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर सकता है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक छह और पी-8 आई विमानों की खरीद के लिए बातचीत शुरू होनी बाकी है। यह भी जानकारी मिली है कि लद्दाख में चीन के साथ गतिरोध से काफी पहले नवंबर 2019 में इस रक्षा सौदे को मंजूरी दे गई थी।
एलएसी और डोकलाम में दिखा चुका है दम
इस विमान का उपयोग समुद्री रक्षा के अलावा अन्य क्षेत्र में भी किया जा सकता है। सेना ने चीन के साथ लद्दाख गतिरोध के दौरान निगरानी के लिए टोही विमान पर भरोसा किया था। इसके अलावा 2017 के डोकलाम विवाद के दौरान भी इसका इस्तेमाल किया गया था।
दक्षिण चीन सागर समेत समुद्र में चीन के बढ़ते कदमों की वजह से यह रक्षा सौदा भारत के लिए काफी अहम है। चीन ने म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान, ईरान और पूर्वी अफ्रीका में पहले ही कई सारे बंदरगाहों का अधिग्रहण कर लिया है। माना जा रहा है कि भारतीय नौसेना के साथ अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन की नोसैना को चुनौती देने के लिए चीन ऐसा कर रहा है। चीन की म्यांमार में क्युकायपु बंदरगाह में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो बंगाल की खाड़ी में स्थित है। दक्षिण श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह हिंद महासागर पर भी हावी है
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एलएसी की तरह हिंद महासागर में भी चीन चल सकता है चाल
सुरक्षा विशेषज्ञों को आशंका है कि चीन ने हाल में एलएसी पर जो कुछ किया, ऐसा ही कुछ वह हिंद महासागर में भी कर सकता है। ऐसे में ड्रैगन का खतरा काफी वास्तविक है और उस पर अभी से सावधानी बरता काफी जरूरी है।