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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बोले- राजनीतिक प्रभाव से मुक्त हो प्रक्रिया

Mon, 26 Oct 2026 06:47 PM IST
अमन मौर्या पीटीआई, ठाणे, महाराष्ट्र

सार

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने कहा है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होनी चाहिए। ठाणे में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने स्वतंत्र संस्थाओं और पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अभय एस. ओका - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अभय ओका ने बड़ा बयान दिया है। पूर्व जज ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होनी चाहिए। उन्होंने स्वतंत्र संस्थाओं की गरिमा की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी तंत्र और एक ढांचे की आवश्यकता पर भी जोर दिया। रविवार को ठाणे में 'फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड अस' (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हम) विषय पर आयोजित एक व्याख्यान में बोलते हुए, जस्टिस ओका (सेवानिवृत्त) ने उच्च-स्तरीय संवैधानिक नियुक्तियों में जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए।

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उन्होंने कहा कि एक ऐसी व्यवस्था और कानूनी प्रावधान बनाना जरूरी है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में राजनीतिक वर्चस्व न चले। उन्होंने सवाल किया कि अगर ज्ञानेश कुमार जैसे किसी चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटा दिया जाए, तो आगे क्या होगा?

कॉलेजियम प्रणाली पर क्या बोले?
उन्होंने बताया कि पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने लगभग 14 साल पहले एक 'कॉलेजियम प्रणाली' का प्रस्ताव दिया था। इसमें प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता, और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते, ताकि एक पूरी तरह से स्वतंत्र चयन प्रक्रिया सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने दोहराया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की नींव हैं। यह रेखांकित करते हुए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसके जरिए वे अपने विचार और दृष्टिकोण व्यक्त कर सकते हैं, उन्होंने कहा कि किसी तर्क का जवाब तर्क से ही दिया जाना चाहिए, न कि शारीरिक बल से।

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उन्होंने कहा, 'हमारे देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा होनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना जीवन अपना अर्थ खो देता है।' इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने 'व्यवस्थित पर्यावरणीय शोषण' की भी आलोचना की। उन्होंने कहा, 'ठाणे और मुंबई में तापमान का 38 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाना एक अभूतपूर्व घटना थी। पिछले एक दशक में, विभिन्न परियोजनाओं के लिए जगह बनाने के लिए ठाणे में हजारों पेड़ काट दिए गए, जिसका खामियाजा अब नागरिक भुगत रहे हैं।'

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पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता पर क्या कहा?
राजनीतिक नेताओं में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की कमी पर अफसोस जताते हुए उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का मतलब धर्म के खिलाफ जाना नहीं है। उन्होंने प्राकृतिक जल स्रोतों में मूर्तियों के विसर्जन जैसी प्रथाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि ये वैज्ञानिक जिम्मेदारी के विपरीत हैं। ठाणे की प्रस्तावित सर्कुलर मेट्रो परियोजना का जिक्र करते हुए, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने कहा कि नागरिकों को यह सवाल पूछने का अधिकार है कि क्या मेट्रो कॉरिडोर पर 12,000 करोड़ रुपये खर्च करने के बजाय, सड़कों को बेहतर बनाकर और ठाणे नगर परिवहन सेवा के बेड़े (वाहनों की संख्या) में काफी विस्तार करके, बहुत कम लागत में वही परिणाम हासिल किए जा सकते थे।

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