जानकारी के अनुसार, जून में फाइजर ने सरकार से कहा था कि कंपनी कौवैक्स समेत सभी समझौतों में प्रतिकूल असर की स्थिति में बचाव चाहती है। लेकिन सरकार का तर्क है कि टीका बनाने वाली कंपनियां स्थानीय मुआवजा शर्तों का पालन करने के लिए राजी हों। इसी शर्त को लेकर अभी सरकार, फाइजर और मॉडर्ना के बीच चर्चा चल रही है। लेकिन अभी तक ठोस निष्कर्ष निकलकर सामने नहीं आया है। सूत्रों की मानें तो सरकार फाइजर और मॉडर्ना को तभी कानूनी बचाव का विकल्प देगी जब सरकार को इनसे ज्यादा टीकों की जरुरत होगी।
स्वदेशी टीके का उत्पादन पर्याप्त रहा तो नहीं होगी विदेशी टीकों की जरूरत
आज भारत में कोरोना वैक्सीन के कई विकल्प मौजूद हैं। सितंबर से नवंबर में स्वदेशी टीका कंपनियां अपनी आपूर्ति को बढ़ा सकती है। ऐसी स्थिति में देश में चल रहे टीकाकरण अभियान में विदेशी टीकों की कोई भूमिका नहीं रह जाएगी। इधर सरकार जायडस कैडिला के जायकोव—डी, बायलाइजिकल-ई के टीके कॉर्बेवैक्स और सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया कोवोवैक्स द्वारा तैयार नोवावैक्स को अगस्त से अक्तूबर के बीच अनुमति प्रदान कर सकती है।