अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बन रही है। ऐसे में सबसे ज्यादा खुश होने वाले देशों में चीन और पाकिस्तान है। जबकि भारत के लिए यह चिंता की बात है। अब भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह ईरान और मध्य-एशिया के लिए तत्काल नए सिरे से रणनीति बनाए। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके लिए सबसे पहले जरूरी यह है कि भारत अमेरिका पर इस बात के लिए दबाव बनाए कि वह ईरान के दूसरे देशों के साथ व्यापारिक संबंधों पर लगी पाबंदी को खत्म करे।
इस पाबंदी के कारण ही भारत ईरान के साथ कोई व्यापार नहीं कर सकता। अभी भारत ईरान से तेल नहीं खरीद पा रहा है। ऐसे में तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद चीन ईरान में भी अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है और ईरान का झुकाव भी चीन की तरफ हो सकता है।
विदेश मामलों के जानकार और इमेजइंडिया इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष रॉबिन्दर सचदेव कहते हैं भारत को अब ईरान को लेकर एक ईमानदार कोशिश शुरू करनी चाहिए। मध्य-एशिया में भारतीय मूल्यों और हितों के लिए एक बड़े नुकसान को रोकने के लिए यह अत्यंत जरूरी है। भौगोलिक रूप से देखें तो मध्य एशिया के देश तुर्कमेनिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कुछ हद तक अजरबैजान भी ईरान अफगानिस्तान, पाकिस्तान और रूस के दक्षिणी क्षेत्र से घिरे हुए हैं। यह पूरा क्षेत्र अब चीन, पाकिस्तान, तुर्की और रूस के प्रभाव में आ रहा है। सिर्फ ईरान ही एकमात्र ऐसा है जो अभी तक पूरी तरह से चीन के प्रभाव में नहीं आया है। अगर ईरान से अमेरिकी प्रतिबंध जल्द नहीं हटाए गए, तो ईरान चीन की धुरी में खिसक सकता है।
गौरतबल है कि ईरान और चीन ने मार्च 2021 में 25-वर्षीय सहयोग कार्यक्रम पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें चीन ईरान से तेल की गारंटी और भारी छूट की आपूर्ति के बदले ईरान में 400 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगा। इस व्यापक आर्थिक सहयोग योजना को सिर्फ ईरान के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण 'गेम चेंजर' के रूप में माना जा रहा है।
दूसरे चश्मे से भी देखें इस समीकरण को
विशेषज्ञ मानते हैं कि मध्य एशिया पर चीन के प्रभाव को व्यापार और अर्थव्यवस्था के अलावा एक अन्य चश्मे से भी देखा जाना चाहिए। अभी मध्य एशियाई देशों में से कुछ की रक्षा खरीद लगभग 20 फीसदी अब चीन से हो रही है। जबकि सात पहले साल पहले यह बामुश्किल दो फीसदी से ऊपर था। आने वाले समय में चीन समूचे मध्य एशियाई देशों में अपनी ताकत बढ़ा सकता है।
इसलिए अमेरिका और भारत को जल्द ही ईरान और मध्य-एशिया में अपने पैर जमाने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि चीन पर ईरान की निर्भरता बढ़ने से वह उसका इस्तेमाल भी भारत के खिलाफ ही कर सकता है। जैसे वह अभी पाकिस्तान का कर रहा है और आने वाले दिनों में अफगानिस्तान का करेगा।
रॉबिन्दर सचदेव का मानना है कि भारत के लिए मध्य-एशिया के दरवाजे पर पैर रखने का एकमात्र तरीका यही है कि ईरान के साथ व्यापार, बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर काम किया जाए। लेकिन यह तब तक नहीं किया जा सकता जब तक अमेरिकी प्रतिबंध जारी रहेगा। बदलते हालात में प्रतिबंध जारी रहने से ईरान चीन की तरफ खिसकता जाएगा। अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने का मतलब यह है कि अमेरिका और भारत को यह कोशिश करनी चाहिए कि ईरान चीन के प्रभाव में नहीं आए।
यदि अमेरिका ईरान से प्रतिबंध नहीं हटाता है और ईरान के साथ व्यापार और लोगों के बीच सहज संबंध बहाल नहीं होते हैं तो मध्य एशिया के देशों से भी अमेरिका, यूरीपीय संघ के देशों और भारत के साथ देर-सबेर निर्यात-आयात व्यापार पर रोक लगने का खतरा बढ़ सकता है।
मध्य एशिया में चीन की तकनीकी ताकत बढ़ेगी
अन्य बातों के अलावा, खतरा इस बात का भी बढ़ रहा है कि चीन के प्रभाव के कारण तकनीक के मामले में भी मध्य-एशिया के देश तेजी चीन पर निर्भर रह सकते हैं। चीन इन देशों को हार्डवेयर, फाइबरऑप्टिक केबल की आपूर्ति करने का एकाधिकार हासिल कर सकता है। इस तरह तकनीक के मामले में भी चीन इन देशों पर अपना आधिपत्य जमा सकता है।