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Rohini Commission Report: क्या BJP के लिए जातिगत गणना की काट बनेगी रोहिणी आयोग की रिपोर्ट, इसमें कितना जोखिम?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Wed, 04 Oct 2023 07:34 AM IST

सार

Rohini Commission Report: बिहार जाति जनगणना सर्वे रिपोर्ट आने के साथ ही रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू करने की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है। पार्टी के कुछ समर्थकों का तर्क है कि भाजपा इसका उपयोग विपक्ष के 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' के नरेटिव का मुकाबला करने के लिए कर सकती है।
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रोहिणी आयोग - फोटो : अमर उजाला
बिहार सरकार की जातीय जनगणना के आंकड़े जारी किए जाने के बाद देशभर में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तरप्रदेश भी इस मुद्दे से अछूता नहीं है। यहां विपक्ष ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष में शामिल भाजपा के सहयोगी दल भी जातीय जनगणना की मांग को फिर से उठाने लगे हैं। 

एनडीए के घटक दल अपना दल (एस) और सुभासपा ने भी जातीय जनगणना कराने की मांग उठाकर भाजपा पर दबाव बढ़ा दिया है। इसके साथ ही अब रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू करने की मांग भी उठने लगी है। सुभासपा के राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता अरुण राजभर का कहना है कि उनकी पार्टी जातीय जनगणना के साथ-साथ रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की मांग भी कर चुकी है। 


आइये जानते हैं आखिर क्या है रोहिणी आयोग? यह आयोग क्यों बना? इसकी रिपोर्ट का क्या हुआ? रिपोर्ट लागू होने से क्या होगा? 

 
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रोहिणी आयोग - फोटो : अमर उजाला
बिहार सरकार की जातीय जनगणना के आंकड़े जारी किए जाने के बाद देशभर में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तरप्रदेश भी इस मुद्दे से अछूता नहीं है। यहां विपक्ष ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष में शामिल भाजपा के सहयोगी दल भी जातीय जनगणना की मांग को फिर से उठाने लगे हैं। 

एनडीए के घटक दल अपना दल (एस) और सुभासपा ने भी जातीय जनगणना कराने की मांग उठाकर भाजपा पर दबाव बढ़ा दिया है। इसके साथ ही अब रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू करने की मांग भी उठने लगी है। सुभासपा के राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता अरुण राजभर का कहना है कि उनकी पार्टी जातीय जनगणना के साथ-साथ रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की मांग भी कर चुकी है। 

आइये जानते हैं आखिर क्या है रोहिणी आयोग? यह आयोग क्यों बना? इसकी रिपोर्ट का क्या हुआ? रिपोर्ट लागू होने से क्या होगा? 

 

पहले जानते हैं क्या है रोहिणी आयोग? 
दो अक्तूबर 2017 को जारी अधिसूचना के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए चार सदस्यीय रोहिणी आयोग का गठन किया गया था। यह आयोग अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उप-वर्गीकरण की जांच करने को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी की अध्यक्षता में बना था। सामाजिक वित्त और अधिकारिता मंत्रालय के मुताबिक, भारत के संविधान के अनुच्छेद 340 के अनुसार इस संविधान आयोग की स्थापना की गई। 

आयोग बनाने का उद्देश्य क्या था?
ओबीसी में आने वाली जातियों के बीच आरक्षण के लाभों के असमान वितरण की सीमा की जांच करना इस आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी। वहीं, ओबीसी के तहत उप-वर्गीकरण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तंत्र, मानदण्डों और मापदण्डों पर काम करने की जिम्मेदारी भी इस आयोग को दी गई थी। इसके साथ ही ओबीसी की केंद्रीय सूची में कई प्रविष्टियों (एंट्री) का अध्ययन करना भी इसके उद्देश्यों में शामिल है। आयोग को मौजूदा ओबीसी की केन्द्रीय सूची में दिख रहे दोहराव, अस्पष्टताओं, विसंगतियों, भाषाई या ट्रांसक्रिप्शन से संबंधित गलतियों के सुधार की सिफारिश करने का काम भी सौंपा गया था। 

इसकी रिपोर्ट का क्या हुआ?
न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) जी. रोहिणी की अध्यक्षता वाले आयोग ने 11 अक्टूबर 2017 को काम शुरू कर दिया था। तब से ओबीसी का उप-श्रेणीकरण करने वाले सभी राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों और राज्य पिछड़ा वर्ग आयोगों के साथ चर्चा की गई। आयोग ने अपने कार्यकाल को 31 जुलाई, 2020 तक बढ़ाने की मांग की थी। हालांकि, कोविड-19 महामारी के चलते देश भर में लागू लॉकडाउन और यात्रा पर बंदिशों के चलते आयोग उसे मिले काम को पूरा करने में नाकाम रहा। इसलिए, आयोग के कार्यकाल में 14 बार विस्तार किया गया। अंततः रोहिणी आयोग ने 31 जुलाई 2023 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। हालांकि, रिपोर्ट में सामने आए सुधारों और सिफारिशों को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। 

रिपोर्ट लागू होने से किसे लाभ होगा?
रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू होने से उन जातियों या समुदायों से जुड़े सभी लोगों फायदा होने की बात कही जा रही है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (एसईबीसी) की केन्द्रीय सूची में शामिल हैं, लेकिन केन्द्र सरकार के पदों और केन्द्र सरकार के शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए वर्तमान ओबीसी आरक्षण योजना का उन्हें फायदा नहीं हुआ था। केंद्र सरकार का कहना है कि आयोग द्वारा ओबीसी की केन्द्रीय सूची में अभी तक हाशिये पर पड़े ऐसे समुदायों को लाभ पहुंचाने के लिए सिफारिशें किए जाने का अनुमान है।

जब रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जा चुकी है तो अगला कदम क्या होगा?
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के मुताबिक आयोग की रिपोर्ट आने के बाद केंद्र सरकार ओबीसी के सभी वर्गों के बीच केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्र सरकार के संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण के लाभों के समान वितरण के तरीकों और साधनों पर विचार कर रहा है।

रोहिणी आयोग - फोटो : अमर उजाला
रिपोर्ट कब लागू होगी और इसका 2024 के लोकसभा चुनावों पर क्या असर हो सकता है? 
सोमवार को बिहार जाति जनगणना सर्वे रिपोर्ट जारी हो गई। इसके साथ ही रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू करने की सुगबुगाहट भी तेज हो गई है। चर्चा है कि सरकार रोहिणी आयोग की सिफारिशों को लागू कर सकती है। पार्टी के कुछ समर्थकों का तर्क है कि यह संभावित रूप से 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए गेम-चेंजर हो सकता है। भाजपा इसका उपयोग विपक्ष के 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' की नरेटिव का मुकाबला करने के लिए कर सकती है और ओबीसी वर्ग की अति पिछड़ी जातियों के बीच अपने समर्थन को और मजबूत कर सकती है। 

पार्टी के कुछ रणनीतिकारों के एक वर्ग को लगता है कि जाति जनगणना से एक ऐसा पिटारा खुल सकता है जिससे भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। उपवर्गीकरण न केवल जाति जनगणना की मांग को बेअसर करेगा बल्कि विपक्ष के नरेटिव को तोड़ने में भी मदद करेगा। 

जाति जनगणना का असर कैसे कम कर सकती है यह रिपोर्ट?
आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसके बाद भी इसे लेकर कई तरह की मीडिया रिपोर्ट आ चुकी हैं। सूत्रों का कहना है कि रोहिणी आयोग ने ओबीसी वर्ग को तीन से चार अलग-अलग वर्गों में बांटने की सिफारिश की है, जिससे उन जातियों को भी लाभ मिल सके जिन्हें अब तक आरक्षण का लाभ नहीं मिला है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आयोग ने अपने अध्ययन में पाया है कि ओबीसी में शामिल 2,633 जातियों में से करीब एक हजार जातियों को बीते तीन दशक में एक बार भी आरक्षण का लाभ नहीं मिला है। आरक्षण का 50 फीसदी लाभ महज 48 जातियों के हिस्से आई हैं। कुल आरक्षण के 70 फीसदी का लाभ महज 554 जातियों ने उठाया है। विश्लेषण मानते हैं कि बिहार की जातिगत गणना के बाद विपक्ष जिस तरह से ओबीसी की गोलबंदी करने की कोशिश कर रहा है भाजपा को उसकी काट इस रिपोर्ट से मिल सकती है।  

रिपोर्ट लागू करने में क्या जोखिम जो अब तक नहीं हुई सार्वजनिक?
विश्लेषकों का कहना है कि केंद्र सरकार के लिए रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को लागू करना जोखिमों से भरा हो सकता है। जाति के आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण के किसी भी प्रयास का मतलब भाजपा के आजमाए हुए हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे से अलग होना हो सकता है। जानकारों का कहना है कि पिछले नौ वर्षों में भाजपा जाति-आधारित नरेटिव को तोड़ने, ऊंची जाति, पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को हिंदुत्व और उसके राष्ट्रवाद की पिच के तहत एकजुट करने में बहुत हद तक सफल रही है। ऐसे में रिपोर्ट को लागू करना भाजपा के लिए फायदे और घाटे दोनों का सबब बन सकता है।  
 
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