वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। प्रधानमंत्री के शपथग्रहण के बाद जनता सरकार के सामने अब मंत्रिमंडल गठन की बड़ी चुनौती थी। चुनौती इसलिए क्योंकि अलग-अलग घटक दलों के कई बड़े नेता सरकार में शामिल होना चाहते थे। सवाल सिर्फ मंत्री पद का नहीं था, बल्कि भारी-भरकम विभागों को लेकर भी रस्साकसी शुरू हो गई।
विनय सीतापति किताब जुगलबंदी में लिखते हैं, शपथग्रहण के कुछ घंटे बाद मध्यरात्रि में घोषणा की गई कि मोरारजी ने अपने मंत्रिमंडल के लिए 19 लोगों को चुना है। इसमें जनसंघ को सबसे कम प्रतिनिधित्व मिला था। इसके 93 सांसदों में से सिर्फ तीन मंत्री थे। इसके पीछे मोलभाव न कर पाने के साथ ही छल-कपट को भी वजह बताया गया। उस समय जनसंघ के सांसद रहे सुब्रह्मण्यम स्वामी शिकायत करते हैं, मोरारजी ने मुझसे कहा था कि तुम वित्त मंत्री बनोगे लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे कह दिया कि मुझे संगठन का काम सौंपा जाने वाला था, जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी। बाद में प्रेस के सामने भी स्वामी ने कई बार मंत्री न बन पाने के लिए अटल को दोषी ठहराया था। इसके अलावा अनपेक्षित रूप से नानाजी देशमुख भी मंत्रिमंडल से बाहर रहे।
दरअसल, पीएम मोरारजी देसाई ने उन्हें उद्योग मंत्रालय देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन ऐन वक्त पर आरएसएस के उस वक्त के सरकार्यवाह रहे राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया की एक सलाह पर वह खुद मंत्रीपद से पीछे हट गए। राजेंद्र सिंह ने नानाजी को बताया कि जनसंघ के कोषाध्यक्ष होने के नाते उद्योगपतियों से आपके अच्छे रिश्ते हैं। अगर आप उद्योग मंत्री बन गए तो सवाल खड़े होंगे। आपकी और पार्टी की छवि खराब होगी। इसके बाद नानाजी चुपचाप पीछे हट गए।