महाराष्ट्र में 'लोक भवन' के फर्जी लेटरहेड, मुहर और सिफारिशी पत्रों का इस्तेमाल कर रेलवे के इमरजेंसी कोटे (EQ) से कन्फर्म टिकट हासिल करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ हुआ है। पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया है और मामले में अन्य आरोपियों की तलाश जारी है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों की पहचान शत्रुंजय राजकुमार यादव उर्फ अनूप (34), मुख्य आरोपी अमरीश ठक्कर और तीन अन्य लोगों के रूप में हुई है। उन्होंने कहा कि इस रैकेट में और भी लोगों के शामिल होने की आशंका है।
फर्जीवाड़ा कैसे किया जाता था?
अधिकारी के मुताबिक, मुख्य आरोपी और रेलवे टिकट के चार दलालों ने 'लोक भवन' (जिसे पहले राजभवन कहा जाता था) के आधिकारिक लेटरहेड, फर्जी मुहर और सिफारिशी पत्र तैयार किए थे। कन्फर्म 3AC रेलवे टिकट हासिल करने के लिए तत्कालीन राज्यपाल के पर्सनल असिस्टेंट के फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया गया। ये टिकट विशेष परिस्थितियों के लिए आरक्षित 'इमरजेंसी कोटा' (EQ) के तहत जारी किए जाते हैं।
मामले का खुलासा कैसे हुआ?
उन्होंने बताया कि यह फर्जीवाड़ा तब सामने आया जब सेंट्रल रेलवे के चीफ कमर्शियल मैनेजर कार्यालय ने 6 फरवरी को सत्यापन के लिए इमरजेंसी कोटे से जुड़े दो सिफारिशी पत्र लोक भवन भेजे। लोक भवन के अधिकारियों ने जांच के बाद पुष्टि की कि ये दोनों पत्र राज्यपाल कार्यालय से जारी ही नहीं किए गए थे।
पुलिस ने मामला कैसे दर्ज किया?
लोक भवन के अधिकारी विशाल सुधीर शिंदे की शिकायत पर मालाबार हिल पुलिस स्टेशन में धोखाधड़ी, जालसाजी और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। शिंदे राज्यपाल के आधिकारिक यात्रा कार्यक्रम का समन्वय करने के साथ-साथ रेलवे को वास्तविक इमरजेंसी कोटा (EQ) संबंधी अनुरोध भेजने के लिए अधिकृत अधिकारी हैं।
किन ट्रेनों के टिकट फर्जी दस्तावेजों से बुक किए गए?
जांच में सामने आया कि लोकमान्य तिलक टर्मिनस (LTT)-राजगीर एक्सप्रेस और छपरा एक्सप्रेस में टिकट बुक कराने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया था। सिफारिशी पत्रों में दर्ज मोबाइल नंबर भी जांच में फर्जी पाए गए।
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आरोपियों तक पुलिस कैसे पहुंची?
अधिकारी ने बताया कि पांचों आरोपियों को टेक्निकल सर्विलांस और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) के आधार पर गिरफ्तार किया गया। अब यह पता लगाया जा रहा है कि यह गिरोह अन्य रेलवे रूटों पर भी सक्रिय था या नहीं। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि प्राथमिकता वाले रेलवे आरक्षण हासिल करने के लिए ऐसे और कितने फर्जी सिफारिशी पत्रों का इस्तेमाल किया गया।