ऑस्ट्रेलिया के 24 समाचार प्रकाशकों के गुट की ओर से टेक कंपनियों से हुई वार्ता में शामिल रहीं एमा मैकडोनाल्ड ने बताया कि यह बेहद तनावपूर्ण वार्ता थी। गूगल-फेसबुक आधुनिक तकनीकों के दम पर अखबारों को विज्ञापन राजस्व में भारी नुकसान पहुंचा रहे थे। अखबारों के मालिक अगले दो-तीन साल में मीडिया रहेगा या नहीं, इस किस्म के सवाल करते थे। ऑस्ट्रेलिया सरकार की मध्यस्थता का प्रावधान कोड में होने से टेक कंपनियों पर दबाव बन सका। भारत के लिए एमा ने सलाह दी कि कानून बनने पर प्रकाशकों को एकजुट होकर टेक कंपनियों से वार्ता करनी होगी। एकजुटता के बिना वे फायदेमंद समझौते पर नहीं पहुंच पाएंगे।
ऑस्ट्रेलिया के जन नीति विशेषज्ञ पीटर लुइस ने बताया कि प्रकाशकों के विज्ञापन राजस्व में आई तेज गिरावट ऑस्ट्रेलिया में कानून बनाने का ट्रिगर पॉइंट बनी। वहीं समझौते की आलोचना
में आज भी फेसबुक-गूगल दावे करते हैं कि इससे बड़े प्रकाशकों को फायदा हुआ, लेकिन हम जानते हैं कि साझा किए राजस्व में से प्रति पत्रकार मिलने वाला हिस्सा देखें तो मात्र 2-3 पत्रकारों
से चल रहे समाचार संस्थानों को बड़े प्रकाशकों के मुकाबले ज्यादा फायदा हुआ है। वहीं अखबार भरने के लिए दिन में 2-3 खबरों पर काम कर रहे पत्रकार अब हफ्ते में 2 खबरों पर काम कर
पा रहे हैं, इससे भी गुणवत्ता सुधरी है। यही वजह है कि भारत या अमेरिका में ऐसे किसी कानून को बनाने की बात पर टेक कंपनियां असहज महसूस कर रही हैं।
आयोजन के आरंभ में डीएनपीए अध्यक्ष तन्मय माहेश्वरी ने डायलॉग के उद्देश्यों से सभी को परिचित करवाया। उन्होंने कहा कि हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब पूरी दुनिया में बड़ी टेक कंपनियों और पारदर्शिता पर बात हो रही है। हमें साथ काम करते हुए सभी पक्षों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने पर विमर्श की जरूरत है। उन्होंने और डीएनपीए के पूर्व अध्यक्ष पवन अग्रवाल ने ऑस्ट्रेलियाई कानून और भारत के संदर्भ में सवाल किए, इस कानून से मिले फायदों, अगले 3 से 5 साल में पत्रकारिता के स्वरूप, पाठकों के डाटा व निजता को टेक कंपनियों से खतरों पर भी बात हुई।