केंद्र सरकार ने राज्यसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) विधेयक- 2023 पेश किया। अब सवाल है कि सरकार को इस विधेयक को पेश करने की आवश्यकता क्यों हुई। इसका एक अहम कारण है मुख्य चुनाव आयुक्त रजीव कुमार के खिलाफ एफआईआर। सीईसी कुमार के खिलाफ दर्ज हुई एफआईआर ने सरकार को सीईसी और चुनाव आयुक्तों (ईसी) को उनके कार्यकाल के दौरान की गई कार्रवाइयों से संबंधित कानूनी कार्यवाही से बचाने के लिए प्रेरित किया। बशर्ते, सभी कार्रवाइयां कानून के तहत ही की गई हों। बता दें, विधानसभा चुनावों के दौरान सीईसी कुमार के खिलाफ तेलंगाना में एफआईआर दर्ज की गई थी।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नए विधेयक में एक संशोधन किया गया है। इसके तहत सीईसी और ईसी को आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते वक्त अदालती कार्रवाई से बचाने के लिए प्रावधान किया गया है, जिससे अधिकारी बिना किसी खौफ के अपना कर्तव्य निभा सकें। यह न्यायिक अधिकारी संरक्षण अधिनियम के बराबर हैं। यह सीईसी और ईसी को चुनावों के प्रबंधन में आपराधिक और नागरिक दायित्व से बचाता है।
1991 वाले विधेयक की जगह लेगा
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) विधेयक, 2023 को पेश करते हुए केंद्रीय कानून मंत्री ने कहा कि विधेयक 1991 के अधिनियम को बदलने के लिए 10 अगस्त को उच्च सदन में पेश किया गया था। यह बहस और पारित होने के लिए अभी लंबित है। पूर्व चुनाव आयुक्तों और सदन में इसका व्यापक विरोध किया गया था। जिसके के चलते इसे फिर से सदन के समक्ष लाया गया है।
कांग्रेस ने जताया विरोध
वहीं, कांग्रेस ने इस विधेयक पर प्रतिक्रिया दी है। वरिष्ठ कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि प्रस्तावित कानून संविधान की मूल भावना को पूरी तरह से नकारता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि यह चुनाव आयोग को पूरी तरह से नकारता है और उसे कार्यपालिका के अधिकार के अधीन कर देता है। यही कारण है कि यह कानून एक मृत बच्चे की तरह है।