सूत्रों ने बताया कि यह महज संयोग की बात हो सकती है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली के अमेरिका जाने के बाद ही नागेश्वर राव ने एफआईआर का फैसला लिया। लेकिन सीबीआई अधिकारियों और अफसरशाही हलकों में यह चर्चा है कि आईसीआईसीआई मामले में ठोस कदम उठाने को लेकर दो बड़े राजनीतिक शख्सियत और खेमों की बीच खासी खींचतान थी।
सूत्रों के मुताबिक किसी पीई को एफआईआर में बदलने का पूरा अधिकार अंतत: निदेशक के पास होता है। लेकिन मामले से जुड़े अधिकारी सवाल उठा रहे हैं कि निदेशक ने केस की मेरिट पर एफआईआर दर्ज करने का फैसला लिया या इसके लिए कोई राजनीतिक इशारा था। सूत्रों के मुताबिक यह संयोग की बात नहीं हो सकती कि निदेशक राव के इस फैसले के बाद जेटली जैसे कद्दावर मंत्री ट्वीट पर सीबीआई को संयम बरतने की सलाह देते हैं और अगले दिन एसपी का तबादला कर दिया जाता है।
सूत्रों के अनुसार एफआईआर में केवी कामत समेत बैंकों के छह बड़े अधिकारियों का नाम शामिल करने की वजह से भी राजनीतिक हलकों में खासी नाराजगी है। सूत्रों के मुताबिक पीई दर्ज करने के छह महीने बाद से सीबीआई में पूर्व निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना का बीच घमासान सिरे चढ रहा था। इस वजह से भी इस मामले में कोई फैसला नहीं लिया जा पा रहा था।