गोवा में जारी 53वें फिल्म भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में बाहुबली, आरआरआर और बजरंगी भाईजान जैसी कामयाब फिल्मों के लेखक केवी विजयेंद्र प्रसाद ने कहा कि वे कहानियां लिखते नहीं, बल्कि अपने आसपास से चुराते हैं। मंगलवार को फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में युवा लेखकों के लिए द मास्टर्स राइटिंग प्रोसेस कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में उन्होंने युवाओं को अच्छी पटकथा और कहानी लिखने के गुर सिखाए।
एक अच्छी कहानी को सच जैसा दिखने वाला झूठ बताते हुए उन्होंने कहा, जो व्यक्ति जितना अच्छा झूठ बोल सकता है, वह उतना ही अच्छा कहानीकार हो सकता है। उन्होंने कहा, एक अच्छी कहानी के लिए कुछ नया नहीं बनाना होता है, बल्कि आसपास मौजूद किस्सों, किवदंतियों और अफवाहों को खूबसूरती से झूठ में लपेटकर पेश करना है। उन्होंने कहा कि अक्सर किसी के भी पास असल में नई कहानियां नहीं होती, बल्कि उन्हें पेश करने का अंदाज नया होता है।
उन्होंने कहा, मैं नई कहानियां नहीं लिखता, बल्कि आसपास से चुराता हूं, क्योंकि हमेशा कहानियां हमारे आसपास ही होती हैं। चाहे वो महाभारत, रामायण या कोई असल जिंदगी की घटना हो। हर जगह कोई-ना-कोई कहानी होती है। उन्होंने युवा लेखकों को बताया कि कहानी लिखने के दौरान हमेशा अपनी कहानी और पात्रों के लिए दर्शकों के अंदर एक भूख पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए।
इसके साथ ही दिमाग को नए विचारों के लिए हमेशा खुला रखते हुए खुद को अपने काम का सबसे मुखर आलोचक बनना चाहिए, तभी आप अपना श्रेष्ठ दे पाते हैं। उन्होंने कहा कि एक अच्छा लेखक वही बन पाता है, जो अपने आसपास की हर चीज को आत्मसात कर पाता है। एजेंसी
- विजयेंद्र ने कहा, मैंने कोई कहानी नहीं लिखी, बल्कि पहले से मौजूद कहानी को निर्देशक, निर्माता, नायक, सहायक और दर्शकों की जरूरतों के मुताबिक गढ़ा इस दौरान सिर्फ एक बात का ध्यान रखा कि कहानी में दिलचस्प मोड़ हों।
द स्टोरीटेलर सत्यजीत रे को विनम्र श्रद्धांजलि : आदिल हुसैन
फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित की गई द स्टोरीटेलर फिल्म को दर्शकों की शानदार प्रतिक्रिया मिली। यह फिल्म महोत्सव के 53वें संस्करण में प्रतिष्ठित स्वर्ण मयूर पुरस्कार की दौड़ में शामिल है। फिल्म में अहम किरदार निभाने वाले अभिनेता आदिल हुसैन ने कहा कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा के महानायक सत्यजीत रे को विनम्र श्रद्धांजलि है।
- आदिल ने बताया कि द स्टोरीटेलर सत्यजीत रे की लघु कहानी, गोल्पो बोलिये तारिनी पर आधारित है। साहित्यिक चोरी के मुद्दे पर उन्होंने कहा, जो कुछ भी मुफ्त में मिलता है, आखिर में उसकी कीमत चुकानी पड़ती है, चाहे उत्पाद हो या कला।