सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त और हॉट स्प्रिंग मिशन के एकमात्र जीवित लद्दाखी हीरो 79 साल के सोनम वांग्याल बताते हैं कि चीन उस वक्त भी दोहरी नीति पर चल रहा था। एक तरफ हिंदी चीनी भाई-भाई तो दूसरी ओर लेह-लद्दाख के सामरिक महत्व वाले इलाकों में जबरदस्त घुसपैठ की रणनीति को आगे बढ़ा रहा था। 1962 की लड़ाई से पहले चीनी सैनिकों ने 1959 में लेह-लद्दाख में जबरदस्त घुसपैठ की थी। चीन के सैकड़ों जवान वहां मौजूद थे। वे हथियारों और दूसरे संसाधनों के मुकाबले भी हमारे जवानों से कहीं बेहतर स्थिति में थे। भले ही हम संख्या में मुट्ठी भर थे, लेकिन हमारे जवानों ने चीन की फौज का खून ठंडा कर दिया था। चीन के सैनिक चप्पे-चप्पे पर मौजूद थे, इसके बावजूद हमारे साथियों ने बहादुरी का परिचय देते हुए न केवल हॉट स्प्रिंग चौकी खाली कराई, बल्कि कई दूसरी पोस्टों से भी चीन के सैनिकों को खदेड़ दिया था।
सोनम वांग्याल के अनुसार, चीन ने 1962 में जो युद्ध छेड़ा था, उसकी कई वर्ष से तैयारी में लगा था। अगर हम ये कहें कि 1959 की घटना महज एक घुसपैठ नहीं थी, बल्कि वह युद्ध की रणनीति का एक हिस्सा थी, तो यह गलत नहीं होगा। हमारे बहादुरों ने उस वक्त चीन को आगे बढ़ने से रोक दिया था। लद्दाख में 16 हजार फुट की ऊंचाई पर तापमान शून्य से 40 डिग्री नीचे था। हमारे पास स्वचालित हथियार नहीं थे। जंगी राइफल थीं, बर्फ में वे जवाब दे गईं। संख्या में तो हम पहले से ही बहुत थोड़े थे। सरकार के पास इंटेलिजेंस इनपुट था कि सितंबर 1959 में चीन के सैनिकों ने कई इलाकों में घुसपैठ की है।
हॉट स्प्रिंग का इलाका हमारे लिए बहुत अहम था। वहां चीनी सैनिक आकर बैठ गए। हम 60-70 जवान थे। एक टुकड़ी में चालीस और दूसरी में बीस-पच्चीस जवानों को शामिल किया गया। हमें टास्क दिया गया कि किसी भी तरह हॉट स्प्रिंग पर चौकी स्थापित करनी है। वहां चीन के सैनिक आ चुके थे। हमारे जवानों ने चौकी पर अपना कब्जा जमा लिया। उस वक्त हमारी छोटी सी टुकड़ी ने चीन के सैनिकों को मार भगाया था। चीन के सैनिक, भारतीय जवानों से डरते भी थे। उनका खून ठंडा होने का एक कारण यह भी था कि वे यह बात अच्छी तरह जानते थे कि भारतीय जवान अगर आगे बढ़ना शुरू हुए तो वे पीछे नहीं हटेंगे। भले ही उन्हें शहीद ही क्यों न होना पड़े। चीन ने हमें लड़ाई में नहीं हराया था। जब हम अपने साथियों को खोजने के लिए जा रहे थे तो धोखे से उन्होंने घेर लिया था। उसी फायरिंग में हमारे दस साथी शहीद हो गए थे।